दिलीप शर्मा | बागबाहरा (महासमुंद) 10 साल 90 करोड़ खर्च: छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में सरकारी धन की बर्बादी और प्रशासनिक लापरवाही का एक बड़ा मामला सामने आया है। बागबाहरा ब्लॉक की दरबेकेरा डायवर्सन परियोजना आज विकास की नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार की जीवंत मिसाल बन चुकी है। दशक भर का समय बीत गया और करीब 90 करोड़ रुपए पानी की तरह बहा दिए गए, लेकिन किसानों के खेतों तक आज भी पानी की एक बूंद नहीं पहुंची है।
फाइलों में दौड़ता पानी, जमीन पर पसरा सूखा
आंकड़े बताते हैं कि इस योजना को लेकर कागजी कार्रवाई तो दुरुस्त है, लेकिन धरातल पर स्थिति शून्य है। पिछले 10 वर्षों का लेखा-जोखा कुछ इस प्रकार है:
| वर्ष | कार्य का विवरण | अनुमानित खर्च |
| 2016-17 | दरबेकेरा डायवर्सन को मिली स्वीकृति | ₹35 करोड़ |
| 2019-20 | प्रभावित किसानों को मुआवजा वितरण | ₹40.72 करोड़ |
| 2019-20 | नहर निर्माण हेतु अतिरिक्त स्वीकृति | ₹19 करोड़ |
| कुल | अब तक का अनुमानित व्यय | ₹90 करोड़ |
परिणाम: करोड़ों खर्च होने के बाद भी न तो नहर का काम पूरा हुआ और न ही किसानों को सिंचाई का लाभ मिला।
प्रोजेक्ट की नाकामी के मुख्य कारण
अधूरा नहर जाल: 18 किलोमीटर लंबी नहर का काम 10 साल बाद भी लटका हुआ है। कई जगहों पर पाइप डालने का काम कछुआ गति से चल रहा है।
तकनीकी विफलता: डायवर्सन में पानी का ठहराव केवल कुछ महीनों तक ही रहता है, जिससे रबी फसलों के लिए यह अनुपयोगी है।
अफसर-ठेकेदार साठगांठ: स्थानीय लोगों का आरोप है कि यह प्रोजेक्ट किसानों के लिए नहीं, बल्कि ठेकेदारों और अधिकारियों की जेब भरने का साधन बन गया है।

“इस साल मिल जाएगा पानी” – विभाग का वही पुराना राग
जब इस संबंध में जल संसाधन विभाग के एसडीओ (बागबाहरा) एफ.के. बढ़ई से बात की गई, तो उन्होंने रटा-रटाया जवाब दिया:
“नहर का काम इस साल पूरा हो जाएगा। 5 स्थानों पर लोहे की पाइप चैन सिस्टम से डाली जा रही है। उम्मीद है कि इस साल किसानों को पानी मिल जाएगा।”
सवाल यह है कि जो काम 10 साल में नहीं हुआ, वह अचानक कुछ महीनों में कैसे पूरा होगा? और पिछले एक दशक की देरी की जिम्मेदारी किसकी है?
दाने-दाने को तरसते किसान
किसान रामनाथ साहू का दर्द छलक पड़ा। उन्होंने कहा, “10 साल से सिर्फ फॉर्म भरवाए जा रहे हैं और सर्वे हो रहा है। मुआवजे के नाम पर खेतों में काम रुकवा दिया गया, लेकिन पानी आज तक नहीं मिला।” वहीं, किसान नेता ललित ठाकुर इसे सीधा भ्रष्टाचार बताते हुए कहते हैं कि किसानों के हक का पैसा कागजों में बह रहा है।
जवाबदेही तय करने का समय (प्रमुख सवाल)
₹90 करोड़ खर्च होने के बाद भी एक भी खेत सिंचित क्यों नहीं हुआ?
क्या केवल मुआवजा बांट देना ही सरकार और विभाग की अंतिम जिम्मेदारी थी?
क्या इस पूरे प्रोजेक्ट की लोकायुक्त या CAG से जांच नहीं कराई जानी चाहिए?
घटिया निर्माण और तकनीकी खामियों के लिए जिम्मेदार अफसरों पर कार्रवाई कब होगी?
जनहित में सुझाव
एक स्वतंत्र तकनीकी जांच समिति का गठन हो जो निर्माण की गुणवत्ता की जांच करे।
प्रोजेक्ट की ऑडिट रिपोर्ट को सार्वजनिक किया जाए ताकि जनता को पता चले कि उनका पैसा कहां गया।
जब तक स्थाई सिंचाई की व्यवस्था न हो, किसानों को वैकल्पिक सिंचाई साधन (जैसे पंप या सोलर) उपलब्ध कराए जाएं।
संपादकीय टिप्पणी: दरबेकेरा प्रोजेक्ट की यह स्थिति छत्तीसगढ़ के सिंचाई दावों की पोल खोलती है। अगर अब भी प्रशासन नहीं जागा, तो 90 करोड़ का यह ‘शो-पीस’ आने वाले समय में केवल एक खंडहर बनकर रह जाएगा।




















