महासमुन्दसमाज

टैगोर जयंती पर आस्था साहित्य समिति ने आयोजित किया संवाद विमर्श

  • गुरूदेव के बहुआयामी व्यक्तित्व और कृतित्व पर वक्ताओं ने रखे विचार ।

महासमुंद ।

राष्ट्रगान जन गण मन के रचियता राष्ट्रकवि गुरूदेव रवींद्रनाथ टैगोर की 157 जयंती पर, कर्मचारी भवन महासमुंद में आस्था साहित्य समिति के संयोजन में, संवाद विमर्श कार्यक्रम का आयोजन हुआ ।मुख्य वक्ता प्रेस क्लब महासमुंद के अध्यक्ष आनंदराम साहू थे।  अध्यक्षता माडल स्कूल आदर्श बालक उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के प्राचार्य एस चंद्रसेन ने की । गुरूदेव टैगोर के चित्र पर माल्यार्पण और सरस्वती वंदना से कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ।

गुरूदेव कहते थे-ईश्वर देवालय में नहीं, किसानों में होता है

  • इस अवसर पर मुख्य वक्ता आनंदराम साहू ने कहा कि गुरूदेव रवींद्रनाथ टैगोर  ऐसे सख्श थे जिन्होंने महज आठ साल के उम्र में पहली कविता लिखी ।
  • 16 साल की उम्र में उनकी पहली लघुकथा प्रकाशित हुई। इस तरह के विलक्षण प्रतिभा के धनी गुरूदेव रवींद्रनाथ एकमात्र ऐेसे राष्ट्रकवि हैं,
  • जिन्होंने भारत को ‘जन-गण-मन” और बांग्लादेश को ‘ आमार शोनार बांग्ला” राष्ट्रगान समर्पित किया है ।
  • भारतीय संस्कृति में नई जान फूंकने वाले गुरूदेव टैगोर के सृजन संसार में साहित्य की कोई ऐसी शाखा नहीं है,
    जिसमें उनकी कलम न चली हो।
  • वे भारत के पहले नोबेल पुरस्कार विजेता हैं, जिन्हें 1913 में साहित्य सृजन के क्षेत्र में इससे सम्मानित किया गया।
  • उन्होंने मानव और अदृश्य शक्ति (ईश्वर) के बीच चिर स्थाई संपर्क को अपनी  रचनाओं में प्रतिपादित करते हुए कहा था कि ईश्वर देवालय में नहीं, किसानों में होता है।
  • जो दिनरात मेहनत कर अन्न् उपजाते हैं। ईश्वर उनमें  होता है, जो पत्थर तोड़कर जनसुविधा के लिए रास्ता बनाते हैं।
  •  गुरूदेव चाहते थे बच्चों को मिले व्यवहारिक शिक्षा- चंद्रसेन

  • अध्यक्षता कर रही प्राचार्य एस चंद्रसेन ने रवींद्रनाथ टैगोर की जीवनी पर  विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि वर्तमान शिक्षा पद्धति में जो नवाचार हो रहे हैं, ये गुरूदेव की दूरदर्शी सोच की ही देन है। स्कूलों से भय का वातावरण समाप्त कर गीत और अभिनय से बच्चों को शिक्षित करने पर उन्होंने  जोर दिया, जो अब सरकारों की प्राथमिकता में है । वे प्रकृति प्रेमी थे,
  • प्रकृति के बीच शिक्षा का विस्तार करने के ध्येय से उन्होंने शांति  निकेतन आश्रम की स्थापना की । गुरूदेव की सोच थी कि बच्चे व्यवहारिक शिक्षा ग्रहण करें, पेड़ में चढ़ना सीखें । तालाब में तैराना सीखें ।
  • केवल किताबी ज्ञान से शिक्षा पूर्ण नहीं होती है।
  •  विश्व बंधुत्व की भावना से ओतप्रोत थे गुरूदेव- आनंद

  • आस्था साहित्य समिति के अध्यक्ष आनंद तिवारी पौराणिक ने कहा कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जहां राष्ट्रीयता की बात करते थे, वहीं
    गुरूदेव टैगोर विश्व बंधुत्व पर जोर देते थे।  गुरूदेव की गीतांजलि एक ऐसी रचना है, जिसकी अनगिनत भाषाओं में अनुवाद हुआ। वे महान राष्ट्रकवि के साथ ही कुशल चित्रकार थे। साहित्य के क्षेत्र में उन्हें नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया। शांति निकेतन की स्थापना करके उन्होंने शिक्षा के लिए जो समर्पण किया, वह आज भी भारतीय संस्कृति और शिक्षण पद्धति का अनूठा उदाहरण
    है।
  • धरती का स्वर्ग है शांति निकेतन

  • छत्तीसगढ़ी साहित्यकार राजेश्वर खरे ने कहा कि कोलकाता यात्रा के दौरान उन्हें गत दिनों शांति निकेतन को करीब से देखने का अवसर मिला है। शांति निकेतन को धरती में स्वर्ग कहा जाए तो अतिशंयोक्ति नहीं होगी। उन्होंनेे कहा कि हर व्यक्ति को जीवन में कम से कम एक बार शांति निकेतन अवश्य जाना चाहिए।  संवाद विमार्श को पंेशनर्स कल्याण संघ के नारायण चंद्राकर, एसआर
    बंजारे, राधिका सोनी ने भी गुरूदेव की व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डाला । संचालन कमलेश पांडेय और आभार प्रदर्शन बंजारे ने किया। इस अवसर पर एसएल सोनी, उमेश भारती गोस्वामी, नारायण पटेल, कुंजू रात्रे सहित गणमान्यजन उपस्थित थे।

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