Sunday, January 24, 2021
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एक दिवसीय संवाद सम्मेलन में  जनपद सदस्या निधि लोकेश चन्द्राकर  एवं जिला पंचायत उपाध्यक्ष लक्ष्मण पटेल हुए शामिल

महासमुन्द /  छत्तीसगढ़ महिला किसान मंच महासमुन्द महिला स्वयं सहायता संघ द्वारा आयोजित जल जंगल जमीन एवं सामुदायिक वनाधिकार संरक्षण पर एक दिवसीय संवाद सम्मेलन में विशेष मुख्य अतिथि के रूप में महासमुन्द जनपद क्षेत्र क्रमांक 14 की जनपद सदस्या श्रीमती निधि लोकेश चन्द्राकर एवं प्रतिनिधि व समाज सेवक लोकेश चन्द्राकर शरीक हुए। साथ ही जिला पंचायत उपाध्यक्ष लक्ष्मण पटेल व सरपंच जगन्नाथ खैरवार सहित महासमुन्द विकासखंड के लगभग 400 महिलाओं ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। ग्राम पंचायत बांसकुड़ा के आश्रित ग्राम कुहरी में एक दिवसीय सम्मेलन आज स्थानीय ग्राम कुहरी पड़ाव आयोजित की गई।जिसमें जनपद सदस्या श्रीमती निधि द्वारा कहा गया कि आज सम्पूर्ण समाज मे केवल 20 प्रतिशत आदिवासी समाज हैं व 50 प्रतिशत का मुनाफा शासन को इसी जंगल से होता है तो शासन को भी आपको सहयोग करना चाइये क्यो क्योकि,आदिवासियों से ही जंगल की सुरक्षा सही तरीके से की जाए।

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ततपश्चात समाज सेवक लोकेश चन्द्राकर ने भी आदिवासी के हित के लिये पुरजोर प्रयास करने में कोई कसर नही छोड़ेंगे और लगभग 6 से 8 माह के दौरान आदिवासी को वनाधिकार पट्टा दिलायेंगे। आज जंगल के जंगल उजड़ रहे हैं। आदिवासी अपनी जमीन से बेदखल हो रहे हैं लेकिन सरकार मानने के लिए तैयार ही नहीं है कि आदिवासियों का भविष्य जमीन से जुड़ा है। आजादी के बाद देश का विकास हुआ, विकास होना भी चाहिए, लेकिन इसकी सबसे ज्यादा कीमत आदिवासियों ने चुकायी, बोकारो स्टील हो, एचइसी हो, राउरकेला स्टील प्लांट हो, सभी जगह उस क्षेत्र के आदिवासी विस्थापित हुए, आज इनकी हालत कोई इन गांवों में जाकर देखें, जमीन से बेदखल होने के बाद आदिवासी कहीं के नहीं रहे, विस्थापन का ख्याल सरकारों ने नहीं किया। बल्कि सरकारें इसके विपरीत रणनीतियां बना रही हैं।
यहां देखिए वीडियो….

आदिवासी समुदाय को बांटने और तोड़ने के व्यापक उपक्रम चल रहे हैं जिनमें अनेक राजनीतिक दल अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए तरह-तरह के घिनौने एवं देश को तोड़ने वाले प्रयास कर रहे हैं। आदिवासी के उज्ज्वल एवं समृद्ध चरित्र को धुंधलाकर राजनीतिक रोटियां सेंकने वालों के खिलाफ हो रहे आन्दोलन को राजनीतिक नजरिये से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता की दृष्टि से देखा जाना चाहिए। तेजी से बढ़ते आदिवासी समुदाय को विखण्डित करने का यह बिखरावमूलक दौर देश के लिये गंभीर समस्या बन सकता है।

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राजनीतिक पार्टियाँ और नेता आदिवासियों के उत्थान की बात करते हैं, लेकिन उस पर अमल नहीं करते। आज इन क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वरोजगार एवं विकास का जो वातावरण निर्मित होना चाहिए, वैसा नहीं हो पा रहा है, इस पर कोई ठोस आश्वासन इन निर्वाचित सरकारों से मिलना चाहिए, वह भी मिलता हुआ दिखाई नहीं दे रहा है। अक्सर आदिवासियों की अनदेखी कर तात्कालिक राजनीतिक लाभ लेने वाली बातों को हवा देना एक परम्परा बन गयी है। इस परम्परा को बदले बिना देश को वास्तविक उन्नति की ओर अग्रसर नहीं किया जा सकता। देश के विकास में आदिवासियों की महत्वपूर्ण भूमिका है और इस भूमिका को सही अर्थों में स्वीकार करना वर्तमान की बड़ी जरूरत है।

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