डॉ. नीरज गजेंद्र: मनुष्य का जीवन अनुभवों और सीख का एक सतत प्रवाह है। वह जन्म से मृत्यु तक स्वयं को समझने, पहचानने और गढ़ने की प्रक्रिया में लगा रहता है। इस पूरी यात्रा में एक गहन सत्य प्रायः ओझल रह जाता है। मनुष्य के भीतर वैराग्य का बीज पहले से ही मौजूद होता है। यह कोई बाहरी उपलब्धि नहीं, बल्कि आंतरिक जागृति है, जो सिर्फ अभ्यास के माध्यम से प्रस्फुटित होती है।
वैराग्य का सामान्य अर्थ संसार-त्याग से जोड़ दिया गया है, जबकि इसका वास्तविक आशय आत्म-बोध है। स्वयं को जान लेना अपने अस्तित्व, अपनी वास्तविक आवश्यकताओं, अपने गुण और सीमाओं को स्वीकार कर जीना ही वैराग्य की पराकाष्ठा है। समस्या यह है कि मनुष्य अपना अधिकांश जीवन स्वयं बनने की बजाय किसी और के जैसा बनने की दौड़ में गंवा देता है। इसके पीछे की सबसे बड़ी वजह बचपन से ही तुलना का बीज है कि फलां जैसा पढ़ो, फलां जैसा बनो, फलां जैसा जीवन जियो। यह तुलना धीरे-धीरे व्यक्ति को उसके स्वभाव, रुचि और आत्मस्वरूप से काट देती है।
विडंबना यह है कि जब व्यक्ति पचास या साठ वर्ष की आयु तक पहुंचता है, तब भी उसके भीतर यह शिकायत शेष रहती है कि उसके सपने पूरे नहीं हुए। पर वह यह नहीं देख पाता कि जिन सपनों के पीछे वह भागता रहा, वे शायद उसके अपने थे ही नहीं। वे सामाजिक अपेक्षाओं, पारिवारिक दबावों और दिखावे की संस्कृति द्वारा उस पर आरोपित कर दिए गए थे। व्यक्ति दौड़ता रहता है, पर उसकी दौड़ को स्वयं मंजिल का पता नहीं होता। यही भटकाव आधुनिक जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी बन चुका है।
कॉरपोरेट और उपभोक्तावादी समाज इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। लोग करोड़ों कमाते हैं, ऊंचे पद पाते हैं, पर भीतर का खालीपन और गहरा होता चला जाता है। आंकड़े बताते हैं कि आज सबसे अधिक अवसाद 40–60 आयु वर्ग में पाया जा रहा है। वही समय, जब व्यक्ति को जीवन की स्पष्टता मिलनी चाहिए। इसका मूल कारण है बाहरी उपलब्धियों को आत्मसंतोष का पर्याय मान लेना। जबकि अध्यात्म स्पष्ट करता है कि संतोष का स्रोत बाहर नहीं, भीतर है।
पतंजलि योगसूत्र का सूत्र अभ्यासेन तु वैराग्येण यही सत्य उद्घाटित करता है। मन की शांति अभ्यास और वैराग्य दोनों से आती है, किंतु वैराग्य अभ्यास से पहले नहीं, अभ्यास से उत्पन्न होता है। अभ्यास का अर्थ नियमित अनुशासन ध्यान, स्वाध्याय, एकांत और चिंतन है। जब व्यक्ति प्रतिदिन अपने विचारों को देखने लगता है, तो वह धीरे-धीरे समझ पाता है कि कौन-सी इच्छाएं उसकी अपनी हैं और कौन-सी उधार ली हुई। आधुनिक न्यूरोसाइंस भी इसी सत्य की पुष्टि करता है। शोध बताते हैं कि अभ्यास से मस्तिष्क नए न्यूरल-पाथवे बनाता है। अर्थात स्वयं को बदलने, परिष्कृत करने और संतुलित करने की क्षमता हर व्यक्ति में अंतर्निहित है। ध्यान और योग मन को स्थिरता और स्पष्टता की ओर ले जाते हैं।
वैराग्य का अर्थ इच्छाओं का दमन नहीं, इच्छाओं के पीछे छिपी जागरूकता को पहचानना है। जब मनुष्य यह जान लेता है कि वह कुछ क्यों चाहता है, तभी वह परिपक्व होता है। प्रतिदिन यदि वह स्वयं को दस मिनट मौन, ध्यान या आत्मचिंतन के लिए दे दे, तो भीतर के द्वार खुलने लगते हैं। यही आत्मबोध वैराग्य की पहली सीढ़ी है। वैराग्य वह शक्ति है जो व्यक्ति को भीड़ में भी स्वयं बने रहने का साहस देती है। यह कोई गुरु बाहर से नहीं देता। यह संस्कार भीतर पहले से मौजूद है। आवश्यकता है केवल अभ्यास, धैर्य और ईमानदार आत्मावलोकन की। यही वह क्षण है, जब बाहरी जीवन का शोर शांत होकर भीतर के संगीत में बदल जाता है।




















