कोमाखान (महासमुंद)| जिले के कुलिया (कोमाखान) स्थित शिव मंदिर परिसर में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के दौरान भागवताचार्य पं. त्रिभुवन मिश्रा जी महाराज ने मानव जीवन, वैदिक परंपराओं, शाकाहार और नाम-जप के महत्व पर गहन और विचारोत्तेजक प्रवचन दिया। कथा के तीसरे दिन उन्होंने विशेष रूप से अजामिल की कथा का विस्तार से वर्णन करते हुए यह संदेश दिया कि कलयुग में भगवान के नाम का स्मरण ही मोक्ष का सबसे सहज और प्रभावी साधन है।
पं. त्रिभुवन मिश्रा महाराज ने कहा कि मनुष्य का शरीर मूलतः शाकाहार के लिए बना है। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि शाकाहारी जीव होठों से पानी पीते हैं, जबकि मांसाहारी जीव जीभ से उठाकर पानी पीते हैं। यह स्वयं प्रकृति का संकेत है कि मानव शरीर मांसाहार के अनुकूल नहीं है। उन्होंने कहा कि जब यह तथ्य स्पष्ट है, तो मनुष्य को शाकाहार आधारित जीवन अपनाना चाहिए। विशेष रूप से वे लोग, जिन्होंने गुरु दीक्षा ली है, तुलसी और रुद्राक्ष की माला धारण की है, उन्हें किसी भी परिस्थिति में मांस और मदिरा से दूर रहना चाहिए। गुरु-दीक्षा केवल बाहरी आडंबर नहीं, बल्कि संयम, शुद्ध आचरण और सात्त्विक जीवन का संकल्प है।
कथा व्यास ने मानव जीवन की विशिष्टता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि सृष्टि में केवल मनुष्य ही ऐसा प्राणी है, जो हंसता-मुस्कुराता है। पशुओं को कभी हंसते-मुस्कुराते नहीं देखा गया, इसलिए जो मनुष्य जीवन में प्रसन्न रहना नहीं जानता, वह पशु समान हो जाता है। मनुष्य का जन्म अत्यंत सौभाग्य का परिणाम है और यह अवसर सभी जीवों को प्राप्त नहीं होता। इसलिए जीवन को आनंद, सदाचार और धर्म के साथ जीना चाहिए।
श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन अजामिल की कथा का मार्मिक और विस्तारपूर्ण वर्णन करते हुए पं. त्रिभुवन मिश्रा महाराज ने बताया कि अजामिल एक समय अत्यंत धर्मपरायण, ब्राह्मण कुल में जन्मा और संस्कारी युवक था। उसने अपने जीवन की शुरुआत वेद अध्ययन, माता-पिता की सेवा और धर्माचरण से की थी। किंतु संगति के दोष के कारण वह धीरे-धीरे अधर्म, व्यसन और अनैतिक जीवन की ओर बढ़ गया। उसका पतन इतना गहरा हुआ कि वह अपने पूर्व संस्कारों को भी भूल बैठा।
महाराज ने कहा कि अजामिल की कथा यह सिखाती है कि मनुष्य अनजाने में भी यदि गलत मार्ग पर चला जाए, तो भी उसके लिए उद्धार का द्वार बंद नहीं होता। जीवन के अंतिम क्षणों में अजामिल ने अपने पुत्र ‘नारायण’ को पुकारा। यह पुकार पुत्र के लिए थी, लेकिन उसमें भगवान के नाम का उच्चारण था। उसी क्षण भगवान के पार्षद प्रकट हुए और यमदूतों को रोक दिया। भगवान के नाम की महिमा ऐसी है कि वह अनजाने में लिए गए नाम-जप से भी मनुष्य को मोक्ष की ओर ले जा सकती है।
पं. त्रिभुवन मिश्रा महाराज ने कहा कि कलयुग में कठोर तपस्या, यज्ञ और बड़े अनुष्ठान हर किसी के लिए संभव नहीं हैं, लेकिन भगवान का नाम-स्मरण सबसे सरल साधना है। जो मनुष्य नाम-जप करता है, उसके लिए मृत्यु के समय यमदूत नहीं, बल्कि भगवान के पार्षद आते हैं। अजामिल का जीवन इस बात का प्रमाण है कि सच्चा पश्चाताप, ज्ञानार्जन और धर्म के मार्ग पर लौटने से जीवन का उद्धार संभव है।
उन्होंने छत्तीसगढ़ की संस्कृति और परंपराओं को बचाए रखने की आवश्यकता पर भी बल दिया। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ संतों की तपोभूमि रही है और यहां की माटी में विशेष आध्यात्मिक ऊर्जा है। संतों के दर्शन के लिए स्वयं भगवान ने धरती पर अवतार लेकर इस क्षेत्र में पदयात्रा की है। माटी के महत्व को रेखांकित करते हुए उन्होंने कुलिया में जन्मे पत्रकार डॉ. नीरज गजेंद्र का उदाहरण दिया और कहा कि संस्कारी व्यक्ति न केवल स्वयं आगे बढ़ता है, बल्कि अपने गांव और क्षेत्र का नाम भी रोशन करता है। व्यक्ति को अपने साथ-साथ अपनी जन्मभूमि के लिए भी कार्य करना चाहिए।
उल्लेखनीय है कि यह धार्मिक आयोजन कुलिया में गजेंद्र परिवार द्वारा जगवीर सिन्हा के जन्मोत्सव के अवसर पर आयोजित किया गया है। कार्यक्रम के मुख्य यजमान ठाकुरराम सिन्हा और लेखन देवी हैं। आयोजन को सफल बनाने में रमेश सिन्हा, जितेंद्र सिन्हा, डोमेंद्र सिन्हा सहित उनके परिवार के सदस्यों की सक्रिय सहभागिता रही। श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के माध्यम से गांव में आध्यात्मिक वातावरण बना हुआ है और बड़ी संख्या में श्रद्धालु कथा श्रवण कर वैदिक जीवन मूल्यों से प्रेरणा प्राप्त कर रहे हैं।





















