कोमाखानराजनांदगांव

बच्चे हो संस्कारित, गाय हमारी माता है रक्षा करना हमारा कर्तव्य, जैनम वेलफेयर के युवाओं ने उठाया बीड़ा   

रायपुर से राकेश सेठिया की रिपोर्ट

जैनम वेलफेयर एसोसिएशन राजनांदगांव के युवाओं ने 15 से 20 साल तक के बच्चे कैसे संस्कारवान हो, आगे चलकर समाज, परिवार और देश की कैसे सेवा कैसे करें। इसके अलावा युवाओं ने गाय की रक्षा करने का संकल्प के साथ आगे बढ़ रहे हैं। युवाओं के उद्देश्य से हर कोई प्रभावित हो रहे हैं। इसके साथ ही लगातार इस संस्था में लोग जुड़ रहे हैं।

ऐसे पहुंचे रहे संस्था के युवा

  • बीते दिन युवाओं को सूचना मिली कि सड़क पर किसी वाहन ने एक गाय को ठाकर मार दी।
  • इसके कारण गाय की पैर की हड्डी टूट गई है।
  • युवाओं ने डाक्टर बुलाकर गाय का परीक्षण करवाया, डाक्टरों ने कहा कि गाय को पिंजरा ले जाना है
  • साथ ही गाय के पैर को काटना पड़ेगा।
  • संस्था में प्रमुख रूप से जैनम बैद, आकाश पारख, दीपेश सेठिया, ऋषभ नहाटा,महक बाफ़ना,
  • संयम (मामा), श्रेयांश बैद, प्रथम जैन ने सेवा दे रहे हैं।

जानिए गौ सेवा कितना महत्वपूर्ण

गो सेवा से राष्ट्र की सुरक्षा एवं सुख-सम्पन्नता सम्भव है। इतिहास साक्षी है कि जब तक भारत में गो सेवा रही, तब तक यह भारत भूमि सुरक्षित एवं सुख सम्पन्न बनी रही। त्रेतायुग में श्रीराम जी ने गो सेवा की प्रेरणा दी। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र जी लाखों गाय दान में देते थे। द्वापर युग में वह गोपाल बने, बाल्याकाल की अवस्था से ही गायों की सेवा करने लगे, गायों को जंगल में चराने ले जाते और संध्या काल उनके नाम पुकार-पुकारकर उन्हें एकत्र कर गोकुल लाते। वेद, पुराण, स्मृतिमें गो-सेवा पर विस्तृत व्याख्या की गई है।

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सभी ॠषि-मुनियों, सन्तों, राजा-महाराजाओं ने गो-सेवा की है। गौ का अध्यात्मिक महत्त्व तो है ही, आर्थिक दृष्टि(drashti) से भी महत्वपूर्ण है और इससे प्राप्त दूध, दही, घी, गोमूत्र और गोमय (गोबर) स्वाथ्यवर्धक रहे हैं। आज बिडम्बना है कि अघ्न्या(अवध्य) कही जाने वाली गौ की हत्या निजी स्वार्थ से प्रारम्भ हुई और आज इसने विनाश का प्रचण्ड रुप धारण कर लिया है।गायों का संवर्धन और संरक्षण एक नितान्त आवश्यकता बन चुकी है। यह संकीर्ण धारणा है कि वृध्द गायोंकी हत्या कर देनी चाहिये, क्योंकि वे अनुपयोगी हो गयी है-

जैन वेलफेेयर

ऐसी गो-हत्या के समर्थकों का एक दुष्प्रचारमात्र है, जबकी गायों की विविध उपयोगिताओं को देखते हुए देश में कोई अनुपयोगी गाय है ही नहीं; क्योंकि बूढ़ी गाय का दूध देना भले ही बन्द हो जाता है; पर मूत्र, गोबर और मरने के बाद अस्थि एवं चर्म की उपयोगिता तो बनी रहती है। इस प्रकार दूध न देने वाली गाय पर भी व्यय से अधिक की प्राप्ति ही होती है।

 

 

 

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