
सर्दी आ चुकी है। हवा में ठंडक है, धूप में मिठास है और वातावरण में एक अजीब-सी शांति व्याप्त है। जब प्रकृति अपने भीतर सिमटती है, पेड़ अपने पत्ते छोड़ देते हैं और धरती विश्राम में चली जाती है, तब मनुष्य के लिए भी यह अपने भीतर झाँकने, संयम बरतने और नए संकल्पों के बीज बोने का समय होता है। धर्मशास्त्रों में मार्गशीर्ष मास को भगवान विष्णु का महीना कहा गया है, जब वे स्वयं मास रूप में धरती पर निवास करते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं शीतोष्णसुखदुःखेषु समत्वं योग उच्यते, अर्थात जो शीत और ताप में समभाव रखता है, वही योगी है। सर्दी का यह मौसम इसी योगभाव का अभ्यास कराता है। बाहर की ठंड हमें भीतर शरीर, मन और आत्मा की ऊष्मा की ओर लौटाती है।
भारतीय परंपरा में ऋषि-मुनियों का जीवन इसका ज्वलंत उदाहरण है। प्राचीन ग्रंथों में वर्णन मिलता है कि जब हिमालय की चोटियों पर बर्फ गिरनी शुरू होती थी, दिशाओं में शीत प्रवाहित होती थी, तब महर्षि, योगी और तपस्वी अपने आश्रमों या गुफाओं में एकांत साधना में लीन हो जाते थे। वे मार्गशीर्ष और पौष मास को आत्मतप के लिए सबसे शुभ मानते थे। कहा जाता है कि ऋषि व्यास ने इसी काल में महाभारत का संकलन प्रारंभ किया, जबकि योगी पतंजलि ने अपने ध्यान और श्वास नियंत्रण के प्रयोग इसी ऋतु में परिपक्व किए। उनके लिए यह ठंड साधना का सबसे उपयुक्त काल था। इस ऋतु में वे शरीर की जड़ता को तोड़कर भीतर की अग्नि को प्रज्वलित करते थे। इस ऋतु में मन और शरीर दोनों आत्मसंयम की भूमिका में प्रवेश करते हैं इसलिए इसे साधना ऋतु भी कहते हैं।
आयुर्वेद की दृष्टि से भी यह ऋतु अत्यंत महत्व रखती है। चरक संहिता में उल्लेख है कि हेमंत और शिशिर ऋतु में मनुष्य की बलशक्ति सर्वाधिक होती है। सर्दी को शरीर-संरचना और रोग-प्रतिरोधक शक्ति के निर्माण का सर्वोत्तम समय माना गया है। इस काल में पाचन अग्नि तीव्र होती है, इसलिए पौष्टिक आहार जैसे घी, तिल, शहद, मूंगफली और गुड़ का सेवन शरीर को ऊर्जा देता है और मानसिक स्थिरता बढ़ाता है। आयुर्वेदाचार्यों ने सर्दी के लिए स्नेहन यानी तेल मालिश और स्वेदन यानी भाप स्नान को विशेष महत्व दिया है। ये शरीर में संचित दोषों को दूर करते हैं और प्राण ऊर्जा को संतुलित रखते हैं। योगाचार्य कहते हैं कि इस ऋतु में सूर्य नमस्कार, भ्रामरी प्राणायाम और अग्निसार क्रिया जैसी साधनाएं शरीर को ऊष्मा प्रदान करती हैं और आत्मशक्ति को जाग्रत करती हैं।
आधुनिक विज्ञान भी इस परंपरा से सहमत दिखाई देता है। शोध बताते हैं कि सर्दी पुनर्जीवन का मौसम है। इस समय शरीर की कोशिकाएँ सक्रिय होकर नई ऊर्जा ग्रहण करती हैं, नींद की गुणवत्ता बेहतर होती है और मानसिक एकाग्रता बढ़ती है। यही कारण है कि ठंड के दिनों में ध्यान, लेखन, चिंतन या कोई भी रचनात्मक कार्य अधिक फलदायी होता है। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में यह मौसम हमें ठहराव और आत्ममंथन का अवसर देता है। बाहर की ठंड हमें भीतर की गर्माहट की कीमत सिखाती है। जब सुबह की गुनगुनी धूप हमें सुकून देती है, तो वह यह भी याद दिलाती है कि सुख का स्रोत बाहरी नहीं, आंतरिक है।
धार्मिक दृष्टि से मार्गशीर्ष माह को प्रत्यावर्तन का काल कहा गया है। कहा जाता है कि इस महीने भगवान नारायण स्वयं पृथ्वी पर मास रूप में अवतरित होते हैं, अर्थात इस समय धर्म, संयम और करुणा के भाव स्वाभाविक रूप से जाग्रत होते हैं। ऋषियों की तरह यदि हम भी इस काल में अपने मन को स्थिर रखें, तो साधारण जीवन में भी असाधारण अनुभूति संभव है। सर्दी हमें सिखाती है कि ठहराव में भी विकास है और शांति में भी ऊर्जा। जैसे बर्फ की परतों के नीचे जीवन ठहरा नहीं होता, बल्कि पुनः जागने की तैयारी करता है, वैसे ही हर मनुष्य को इस मौसम में अपनी संभावनाओं को भीतर गढ़ने का अवसर लेना चाहिए।
यह मौसम हमें बताता है कि जो भीतर के सूर्य को पहचान लेता है, उसके लिए कोई भी सर्दी केवल ऋतु नहीं रहती— वह साधना बन जाती है। आधुनिकता और आध्यात्म का यह सुंदर संगम सर्दी में सहज दिखाई देता है। एक ओर तेज़ रफ्तार जीवन की चमक है, तो दूसरी ओर ध्यान, योग और आत्मसंवाद की पुकार। यही वह समय है जब भीतर का सूर्य सबसे गहराई से जगता है, और जीवन अपने मौन में भी अर्थपूर्ण हो उठता है।
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