देश में पत्रकारिता बन गया भद्दा मजाक, क्या अर्नब इसे बचा पाएगा?

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दिलीप शर्मा: जिस तरह देश में पत्रकारिता पर हमला हो रहा है, उससे नहीं लगता कि अब चौथा स्तंभ की कोई अहमियत बची हो। अब तक नीचले स्तर के पत्रकारिता पर हमला हो रहे थे, जिसकी आवाज सरकार के कानों तक भी नहीं पहुंच रही थी। अब उच्चस्तर के पत्रकारिता पर हमला होने के बाद सरकार के कानों तक तो बात पहुंची,  लेकिन बेबस नजर आ रहे हैं। पत्रकार अर्नब के साथ जो वर्तमान में हो रहा है उसे पूरा देश देख रहा है।
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अब तक के राजनीति में धरना-प्रदर्शन और अर्नब के सपोर्ट में सामने तो आए हैं। लेकिन महाराष्ट्र सरकार के सामने सब घूटने टेक दिए हैं। अब इसमें समझ ये नहीं आ रहा है कि अर्नब गुंडा है कि सरकार? खूंखार अपराधी की तरह खूंखार जेल में अर्नब को भेजा गया है। अब तक के स्थिति में ये तो साफ हो गया कि सरकार किसी को भी किसी भी मामले में फंसाकर जेल भेज सकती है। पत्रकारिता में सरकार की वाहवाही करो तभी आप पत्रकारिता कर सकते हो अन्यथा आप अपना पत्रकारिता का दुकान बंद करो और दूसरे कार्य में लग जाओं।

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निर्लजता और बेशरमी चेहरा महराष्ट सरकार का सामने आया है। अर्नब रो-रोकर कह रहा है कि मुझे मारा जा रहा है, मेरी हत्या की जा सकती है। इस घटना को देखकर पूरा देश विवशताभरी निगाहों से देख रहे हैं। न्याय से परे अन्याय के खिलाफ हल्ला तो बहुत हो रहा है। पर इस अन्याय का हल निकलता नहीं दिख रहा है। क्या? अब पत्रकारिता का कोई औचित्य नहीं रह गया। आज सोमवार को मुबंई हाईकोर्ट फैसला सुनाने जा रही है। अब इस फैसले को देखना होगा कि अर्नब की जीत होती है, या फिर महराष्ट सरकार की गुंडागर्दी की।

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