महासमुंद : पढ़ना न भूले कवि जवान अनिल यादव रचित बिसाहू के टुरा 

महासमुंद। बिसाहू के टुरा छत्तीसगढ़ी में लिखी गई व्यग्यात्मक कविता है, जो वर्तमान समय मे किसान और जवान की मनो स्थिति का बेहतरीन चित्रण वर्णित है:-

पढ़िए : छत्तीसगढ़ी कविता – बिसाहू के टुरा

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काली रेगेव शहर कोती, लाने बर मय खातू,

गाड़ी ल चलावत राहों, अउ पाछु म बइठे बरातू।

रद्दा म फरफट्टी हमर,  जबर दे दिस घोखा,

कालीच टुरा भराय रिहिस, तेल अब्बड़ अकन चोखा।

बाढ़े मंहगई म ठार सुखागे, टँकी तेल मोर गाड़ी के,

कोरी कोरी के तेल पियागे, साग पान बोहागे मोर बारी के,

पाँच सौ के बुता ह संगी, फेर आज बनगे जी।

गाड़ी ल चलाएव थोकन, काटा ओखर चढ़गे जी।

गाड़ी ल कुदावत मेहा, पहुचेव सोज दुकान,

कीमत सुन खातू के संगी खड़ा होगे दुनो कान।

पांच बोरी खातू के लेवैया, दु ठन म दरर गेव,

पैसा ह सिरागे तहन, सुटुंग ले निकल गेव।

चउंक म मोला ठाड़े मिलिस, बिसाहू के पुलिस टुरा,

केरवच कस दिखत राहय, फेर पहिली दिखय हीरा।

 हाथ म धरे डंडा मोटहा, अउ सिटी ल बजावत रहाय ।

आत जात सब मनखे मन ल, मुहतोपना बर जोजियावत रहाय।

तीर म मय ओकर जाके, बतादेव जम्मो पीरा ल।

पैसा ल मय मांग परेव, खवा के झोला के खीरा ल।

करजा,भाड़ा, तेल, नून, अउ, महीना के पइसा कट गिस।

हाल ओखर सुनके मोर, गोड़ भीतरी भुइयां खसक दिस,।

मोर संसो ह कमती पड़गे, ओखर दुख के आगू म।

पइसा उहि ल देके आगेंन, जेला धरे राहय बरातू ह।

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अनिल यादव(अभिअन्नु)

छत्तीसगढ़ पुलिस, महासमुन्द