महासमुन्द : जवान अनिल यादव की स्वरचित लघुकथा अस्थियां दिल छू लेंगी

महासमुन्द : जिले के पुलिस विभाग में पदस्थ आरक्षक अनिल यादव अपने कर्तब्यों के साथ साथ लगातार  मानवीय और जनसेवा कार्य के लिए सुर्खियों में बने रहते है। इसके अलावा अपने स्वरचित कविताओं में वर्तमान परिस्थितियों पर तीखी व्यग्य, देश प्रेम, एवं समाज को जागृत करने वाले प्रेरणा दायक संदेश को समाहित कर कविता लेखन करने में उनकी विशेष रुचि है। जवान अनिल यादव ने लघु कथा अस्थियां के माध्यम से एक मार्मिक संदेश सभी तक पहुचाने की कोशिश की है:-

पढिए : स्वरचित लघुकथा अस्थियां……...

“जिंदगी की कीमत शून्य होते हमने अपने समय मे शायद पहली बार देखा था। मौत का ऐसा मंजर की लाशों के अंतिम संस्कार हेतु भी सरकारी योजनाओं से लाभान्वित होने की भांति पंक्तियों में खड़े होना पड़ रहा था।

हम उस दिन सासु माँ के पार्थिव शरीर के साथ श्मशान घाट (मुक्तिधाम) में प्रवेश करने वाले प्रथम शौभाग्यशाली परिजन थे। हिन्दू रीति रिवाज की सभी  प्रक्रिया ससुर जी के हाथों सम्पन्न कराकर मुखाग्नि दिलाई। अगले ही क्षण एक एम्बुलेंस पार्थिव शरीर रहित मुक्तिधाम के भीतर आया।

मुक्तिधाम में वैतनिक कार्य करने वाले महज 20 से 25 साल के 5 युवा  लड़को का काम काफी काबिले तारीफ था। बातों ही बातों में उन्होंने बताया sir कल दिनभर में लगभग 54 लाशों का दाह संस्कार हुवा है, जिनकी राख अवशेषों का उठाव, विसर्जन और मुक्तिधाम की सम्पूर्ण साफ सफाई करने में हालत पस्त हो गई है।

सासु माँ की जलती चिता की ओर नजर जमाए,हम आपस मे आगे के कार्यक्रम की चर्चा में मशरूक हो गए। तभी श्मशान के मुख्य द्वार से दो नन्हे कदमो को अंदर आते देख कलेजा धक सा रह गया।

दोनो लड़किया थी, जिसमे से एक कि उम्र लगभग 12 और दूसरे की महज 6 वर्ष ही रही होगी। उन्हें देख  अंतर्मन कई अनगिनत, अनसुलझे, प्रश्नवाचक सवालों के लहरों में गोते खाने लग गया”

उन प्रश्नों के जवाब हेतु मैं अति आतुर था, तुरन्त उनके समीप जाकर, उनके वहा आने का कारण पूछा तो बड़ी बेटी ने बताया

 * “अंकल जी हम मम्मी की अस्थियां लेने आये है” *

इतना सुनक उनके मार्मिक दुखो के शतक के सामने मेरा दुख दहाई पर आ टिका। पिताजी के बारे में पूछने पर बताया कि, उनको एम्बुलेंस वाले अंकल हॉस्पिटल लेकर गए है। वे कल किसी से फोन पर बात कर रहे थे कि जाकर मुक्तिधाम से अस्थियां लाना है। लेकिन अभी तक कोई नही आया

यह सुनकर मैं स्तब्ध रह गया तथा मन ही मन सोचने लगा की समाज के लोगो में मानवता, संवेदना पहले से नही थी या कोरोना ने इनके दोमुहे चेहरे से नकाब नोच कर बेनकाब कर दिया है ?

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अनिल यादव(अभिअन्नु)

छत्तीसगढ़ पुलिस, महासमुन्द