महात्मा गांधी जयंती: गांधी ग्राम तमोरा में बापू वाटिका का आज लोकार्पण

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महासमुंद। 1930 का सविनय अवज्ञा आंदोलन पूरे रायपुर नगरीय क्षेत्र में ज़बरदस्त तरीक़े से चल रहा था। महात्मा गांधी अहिंसा के पुजारी थे। देश को आजादी दिलाने उन्होंने क्रांतिकारियों से हिंसा का रास्ता छोड़ने अभियान चलाया था।  उस समय महासमुंद के गांवों में भी आजादी के मतवाले गांधी जी के रास्ते पर चलकर देश की स्वतंत्रता के लिए लड़ाई लड़ रहे थे। उस दौर में आजादी की चाह  रखने वालों में में महासमुंद का योगदान भी कम नही था इसका आग़ाज़ बागबाहरा के तमोरा गांव से हुआ था।

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गांधी जी के रास्ते चल रहे यहां के लोगों ने जंगल सत्याग्रह के जरिए अंग्रेजों के खिलाफ आजादी का शंखनाद किया था।जंगल सत्याग्रह के जरिए इस इलाके के आदिवासियों ने अपनी पीड़ा को व्यक्त की थी। यहां के आदिवासियों ने अंग्रेजी जंगल कानून को तोड़कर अपने हक को हासिल किया था। आंदोलन की अगुवाई तमोरा गांव की युवती दयाबती कर रही थी। दयाबती वही युवती है जिसने महात्मा गांधी के रास्ते पर पूरे वनांचल को चलाए थे और आदिवासियों पर अंग्रेजों का अत्याचार बढ़ता देख इतिहास के पन्नों में महासमुंद क्षेत्र का नाम दर्ज करवा दिया।

महासमुंद से लगभग 18 किलोमीटर दूर बागबाहरा ब्लाक के इस आदिवासी बहुल ग्राम तमोरा को गांधी ग्राम का दर्जा प्राप्त है। कल शनिवार 02 अक्टूबर को खल्लारी विधायक द्वारिकाधीश यादव बापू वाटिका का लोकार्पण करेंगे। यह वाटिका लगभग 8 लाख रुपए की लागत से निर्मित हुई है। घने जंगल से घिरे इस गांव में आज भी दयाबती के शौर्य को ताजा रखने का प्रयास किया गया है। महासमुंद जिले का अधिकांश भू भाग अभी भी वनों से घिरा हुआ है। आदिवासी बहुल इस क्षेत्र के लोगों का जीवकोपर्जन वनोपज से ही होता रहा है अब खेती के सहारे लोग अपने परिवार का गुजर.बसर करते हैं।

आदिवासियों की जीवन शैली मूलरूप से शांत ही रहती हैए लेकिन कोई उन्हें छेड़ दे तो उनके आक्रोश को सम्हाल पाना मुश्किल हो जाता है। बतादें कि 1930 में ही प्रारंभ किए गए अंग्रेजों के जंगल कानून के तहत पशुओं को चारा के लिए जंगल में प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। घरों में पशुओं को बांधे रखने की मजबूरी हो जा रही थी। बताया जाता है कि जंगल कानून को अमल में लाते हुए अंग्रेजों ने तमोरा और आसपास के गांव के अधिकांश मवेशियों को पकड़ लिया थाए इतना ही नहीं मवेशी मालिकों के खिलाफ जंगल कानून तोड़ने का आरोप भी लगा दिया गया। आदिवासियों को जंगल कानून के नाम पर प्रताड़ित किया जाने लगा था।

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अंग्रेजों के इस सख्त रवैए के खिलाफ सत्याग्रहियों ने अंग्रेज अफसरों से पशुओं को छोड़ने का आग्रह किया और जब वे नहीं मानें। वनवासियों ने अंग्रेजों के खिलाफ शंखनाद का संकल्प पारित कर लिया। अपने आंदोलन की जानकारी छत्तीसगढ़ के लिए स्वतंत्रता आंदोलन की कार्यवाही देख रहे प्रख्यात सेनानी यति यतनलाल और शंकर गनौदवाले के माध्यम से पं रविशंकर शुक्ल को इसकी जानकारी दी गई। दोनों नेताओं ने वनांचल के गांवों का भ्रमण कर आंदोलन की तैयारियों का जायजा लिया। 6 सितंबर 1930 को लभरागांव में जंगल कानून तोडने का आखिरी प्रस्ताव पारित किया गया।