ब्रेकिंग न्यूज़: जल संसाधनों के संरक्षण में जुटा भारत का ‘जल पुरुष’
भारत के प्रसिद्ध पर्यावरणविद् और ‘जल पुरुष’ के नाम से मशहूर राजेन्द्र सिंह ने हाल ही में रांची में जल, पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन पर अपने विचार साझा किए। उनकी मेहनत और दृष्टिकोण ने उन्हें वैश्विक स्तर पर सराहना दिलाई है।
जल और संस्कृति का संबंध
राजेन्द्र सिंह ने कहा कि आजकल विकास परियोजनाओं में प्रकृति और संस्कृति के बीच का तालमेल खो गया है। प्राचीन भारत में इन दोनों का एक समृद्ध संबंध था। उन्होंने कहा, "विकास के नाम पर हम अपने पर्यावरण को नष्ट कर रहे हैं। यह जरूरी है कि हम अपनी प्राचीन मान्यताओं की ओर लौटें, जो प्रकृति का सम्मान करती हैं।"
विकास की इस अंधी दौड़ में हम कई बार पीड़ितों के रूप में परिणत हो जाते हैं। इसलिए, उन्होंने सुझाव दिया कि भारत को अपने मूल्यों की ओर वापस लौटना चाहिए ताकि सतत विकास को संभव बनाया जा सके।
नदियों का महत्व और पूजा
जब राजेन्द्र सिंह से नदियों के महत्व पर पूछा गया, तो उन्होंने कहा, "हम नदियों को पूजते हैं, लेकिन खुद उन्हें प्रदूषित कर रहे हैं। यह हमारे प्राकृतिक प्रेम की कमी को दर्शाता है। हमें अपनी नदियों के प्रति सम्मान बहाल करने की आवश्यकता है।"
उन्होंने कहा कि भारत की पारंपरिक ज्ञान प्रणाली ने हमें नदियों को हमारे जीवनदाताओं के रूप में देखने की शिक्षा दी है। आज का समय हमें यह सिखाता है कि नदियों को पुनर्जीवित करने के लिए हमें अपने दृष्टिकोण को बदलना होगा।
जलवायु परिवर्तन से लड़ाई में नदियों की भूमिका
राजेन्द्र सिंह ने स्पष्ट किया कि नदियाँ, मिट्टी और हरियाली एक-दूसरे से अटूट जुड़े हुए हैं। "पिछले 50 वर्षों से मैं बार-बार यही कह रहा हूं कि जब नदियाँ बहती हैं, तो वे मिट्टी को पोषित करती हैं और हरियाली को पुनर्जीवित करती हैं। इसके फलस्वरूप, वायुमंडल में विषैले गैसों की मात्रा कम होती है।"
इसके अलावा, उन्होंने बताया कि जलवायु परिवर्तन के विरूद्ध लड़ाई में नदियों की महत्वपूर्ण भूमिका है। जब नदियाँ स्वस्थ होती हैं, तो हमारा पर्यावरण भी स्वस्थ होता है।
प्रदूषण और चुनौतियां
राजेन्द्र सिंह ने प्रदूषण की समस्या पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि तेजी से औद्योगिकीकरण एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। "हमारे देश का ध्यान अब सिर्फ आर्थिक विकास की ओर है, जो कई बार पर्यावरण को नजरअंदाज कर देता है।"
उन्होंने सुझाव दिया कि हमें एक बार फिर से अपने लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरूक करने की आवश्यकता है, ताकि समाज में संतुलन स्थापित हो सके।
राजेन्द्र सिंह का संदेश स्पष्ट है: यदि हम प्रकृति के प्रति अपने दृष्टिकोण में बदलाव नहीं लाते, तो न केवल हमारे जल संसाधन, बल्कि हमारा पर्यावरण भी संकट में पड़ेगा। ऐसा करने से ही हम सतत विकास की ओर बढ़ सकते हैं।
