परीक्षा रूपी पर्वत को मनोबल, अनुशासन और आत्मविश्वास से लांघने की साधना पर पढ़िए पत्रकार डॉ. नीरज गजेंद्र का विशेष आलेख

डॉ. नीरज गजेंद्र

डॉ. नीरज गजेंद्र

परीक्षा का समय आते ही वातावरण बदल जाता है। घरों में घड़ी की टिक-टिक तेज लगने लगती है, माता-पिता की अपेक्षाएं स्पष्ट दिखने लगती हैं। युवाओं के मन में अनजाना दबाव आकार लेने लगता है। पर क्या सचमुच परीक्षा कोई दुर्गम पर्वत है या यह मन की कल्पना से बना हुआ एक ऊँचा शिखर है, जिसे सही दृष्टि, अनुशासन और आंतरिक शक्ति से सहजता से लांघा जा सकता है। भारतीय परंपरा में शिक्षा महज अंकों का खेल नहीं रही, यह आत्मविकास की साधना रही है। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं योगः कर्मसु कौशलम् अर्थात कर्म में कुशलता ही योग है। परीक्षा की तैयारी भी एक कर्म है। इसे भय से नहीं, कौशल और समर्पण से किया जाए, तो परिणाम स्वतः श्रेष्ठ होते हैं। गीता का यह सिद्धांत आधुनिक मनोविज्ञान के फ्लो स्टेट से मेल खाता है, जिसमें व्यक्ति पूरी तल्लीनता से कार्य करता है और चिंता स्वतः समाप्त हो जाती है।

प्राचीन गुरुकुलों में ब्रह्मकाल अर्थात सूर्योदय से पूर्व का समय अध्ययन के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया। आयुर्वेदाचार्य चरक और सुश्रुत ने भी इस काल को स्वास्थ्य और स्मरणशक्ति के लिए अनुकूल बताया है। आधुनिक न्यूरोसाइंस के अनुसार सुबह के समय मस्तिष्क की प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स अधिक सक्रिय होती है, जिससे एकाग्रता और विश्लेषण क्षमता बढ़ती है। यही कारण है कि जो विद्यार्थी नियमित रूप से प्रातःकाल अध्ययन करते हैं, उनकी सीखने की गति और स्मरण शक्ति बेहतर पाई जाती है। ब्रह्मचर्य का अर्थ इंद्रिय संयम नहीं, ऊर्जा का संरक्षण और लक्ष्य की ओर उसका केंद्रित उपयोग है। मनुस्मृति में कहा गया है कि विद्यार्थी जीवन में संयम और अनुशासन अनिवार्य हैं, क्योंकि यही चरित्र और ज्ञान की नींव रखते हैं। आज के संदर्भ में इसका अर्थ है डिजिटल विचलनों से दूरी, समय का संतुलित उपयोग और अनावश्यक मानसिक व्यर्थताओं से बचाव है। शोध बताते हैं कि अत्यधिक स्क्रीन-टाइम स्मरणशक्ति और ध्यान क्षमता को कम करता है। इसलिए परीक्षा के दिनों में डिजिटल ब्रह्मचर्य भी उतना ही आवश्यक है।

अब प्रश्न है कि परीक्षा के दौरान ऊर्जावान और प्रसन्न कैसे रहें। तो इसका  पहला सूत्र संतुलित दिनचर्या है। पर्याप्त नींद स्मृति सुदृढ़ करने में सहायक है। हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के शोधों में सिद्ध हुआ है कि नींद के दौरान मस्तिष्क दिनभर की सीखी गई जानकारी को व्यवस्थित करता है। दूसरा है सात्त्विक आहार। आयुर्वेद के अनुसार हल्का, पौष्टिक और सुपाच्य भोजन मन को स्थिर रखता है। तीसरा योग और प्राणायाम है। अनुलोम-विलोम और भ्रामरी जैसे अभ्यास तनाव हार्मोन को कम करते हैं और आत्मविश्वास बढ़ाते हैं। और चौथा सूत्र सकारात्मक आत्मसंवाद है। जब आप स्वयं से कहते हैं, कि मैं सक्षम हूं। तो मस्तिष्क उसी विश्वास के अनुरूप कार्य करने लगता है।

परीक्षा के समय प्रसन्न रहना एक भावनात्मक सलाह नहीं, वैज्ञानिक रणनीति है। सकारात्मक मनोविज्ञान के अनुसार खुश मन रचनात्मकता और समस्या-समाधान क्षमता को बढ़ाता है। इसलिए ऐसा व्यक्तित्व विकसित कीजिए कि आपको देखकर दूसरों का मन भी प्रसन्न हो जाए, क्योंकि ऊर्जा संक्रामक होती है। समझिए, परीक्षा जीवन का अंतिम सत्य नहीं, आत्मपरीक्षण का अवसर है। मन को जीत लीजिए, जग अपने आप जीत लिया जाएगा।

जो भाग्य में नहीं वह कैसे मिलेगा, बता रहे वरिष्ठ पत्रकार डॉ. नीरज गजेंद्र

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