जहाँ अनुभवी, कुशल शिक्षको के साथ साथ स्थानीय योग्यताधारी युवाओं के द्वारा बतौर शिक्षक विषयो का अध्यापन कराया जाता था

 महासमुंद। उस समय ग्राम तुमगांव आसपास के गाँवो का हृदय स्थल हुवा करता था क्योंकि शहर के बुद्धजीवी, रसूखदार एवं  स्थानीय लोगो की सहमति से यहां एक प्राइवेट हाईस्कूल स्थापित किया गया था। जहाँ अनुभवी, कुशल शिक्षको के साथ साथ स्थानीय योग्यताधारी युवाओं के द्वारा बतौर शिक्षक विषयो का अध्यापन कराया जाता था।

उसी स्कूल में अनिल कक्षा 10 का छात्र था। पढ़ाई के प्रति लगन और मेहनत के चलते  70 प्रतिशत अंको सहित दसवीं की      परीक्षा उत्तीर्ण हुवा था। आगे की पढ़ाई के लिए विषय चयन करना, एक नई चुनौती को जन्म दे रही थी। दोस्तो से राय      मशवरा और परिजनों के सलाह उपरांत अनिल ने 11वी में गणित विषय का चयन किया।

              विज्ञान, अंग्रेजी, हिंदी, भौतिकी विषय के अधयापन  के समय अन्य संकाय के छात्र एक साथ बैठकर पढ़ाई किया करते थे। जिससे पूरा कमरा खचाखच भर जाता था।

              स्कूल में सामने एवं पीछे की बैच में बैठने वाले छात्रों के प्रति शिक्षको की मनोस्थिति से आप सभी वाकिफ जरूर होंगे। अक्सर पीछे के छात्रों के प्रति व्यवहार व अध्यापन में दिलचस्पी न्यून ही रहती है। अनिल का दुर्भाग्य था, कि उसे पीछे वाले बैच में बैठने का स्थान मिला एवं ऐसे ही मनो स्थिति वाले एक शिक्षक से भी उनका सामना हुवा।

             अक्सर कुछ समस्या आने पर जब-जब पीछे के छात्रों के द्वारा उक्त शिक्षक से प्रश्न पूछा जाता था। तो शिक्षक महोदय द्वारा “अगले साल मिलना”…….. . कहकर जवाब देते थे। जिससे कक्षा में हंसी गूंज जाती और पुछने वाले छात्र अपना मन छोटा करके शांत होकर बैठ जाया करते थे।

               👉 कुछ साल बाद…… अनिल अब एक सरकारी मुलाजिम हो गया था तथा कार्यालय के बाहर चाय की दुकान में अपने अन्य सहकर्मियों के साथ चाय चर्चा पर मशरूक थे।

              तभी सहसा कुछ दूर पर चाय पी रहे एक व्यक्ति पर अनिल की नजर जा टिकी। अनिल ने पास जाकर उस व्यक्ति के पैर छुकर अभिवादन किया और पूछा sir जी आप यहां कैसे। Sir जी ने बताया कि स्कूल से निकाले जाने के बाद कुछ दिन गांव में ही कृषि कार्य करते रहा, फिर एक संविदा पोस्ट पर आवेदन करके अभी मुख्यालय में कार्यरत हु।

                बात ही बात में sir जी ने पुरानी बातों को याद करते हुए कहा अक्सर तुम लोगो के सवाल पर, “अगले साल मिलना”… बोल कर व्यंग्य कसा करता था। लेकिन आज कई सालों बाद मुझसे यू मिलकर, तुमने उस वाकिये को सच कर दिया।

 ………. शिष्य और गुरु के आंखों में आंसू थे, और सहकर्मी इस रहस्य से अंजान दोनो का मुँह ताक रहे थे।

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अनिल यादव(अभिअन्नु)

छत्तीसगढ़ पुलिस महासमुन्द