पढ़िए वरिष्ठ पत्रकार डॉ. नीरज गजेंद्र का लिखा चिंतन- मंच पर अपराधी और कोने में नैतिकता

डॉ. नीरज गजेंद्र

चिंतन | डॉ. नीरज गजेंद्र

आज जब हम अपने चारों ओर के सामाजिक परिदृश्य पर नजर डालते हैं, तो एक गहरी चिंता सिर उठाती है। नैतिकता, चरित्र और न्याय जैसे शब्द धीरे-धीरे सार्वजनिक जीवन से लुप्त होते जा रहे हैं। पाखंड, संरक्षण और सत्ता का दुरुपयोग इनकी जगह ले रहे हैं। जब अपराधी सम्मानित होने लगें, जब मंचों पर आदर्श की जगह पाखंडी विराजमान हों, जब सत्य और न्याय पर सत्ता और सामर्थ्य भारी पड़ जाए, तो समझ लीजिए कि समाज नैतिक रूप से दीवालिया होने की कगार पर है। यह चिंता मात्र किसी एक संवेदनशील व्यक्ति की नहीं, बल्कि हर उस नागरिक की होनी चाहिए जो अपने बच्चों को एक बेहतर, सुरक्षित और मूल्यनिष्ठ समाज देना चाहता है। आज हम एक ऐसे मोड़ पर खड़े हैं जहां सत्ताधारी अपराधी प्रेरणास्रोत बनाए जा रहे हैं और सच्चे नागरिक तिरस्कार का पात्र बनते जा रहे हैं।

ओडिशा सीमा से सटे छत्तीसगढ़ के एक कस्बे  की घटना ने एक बार फिर समाज की आत्मा को झकझोर दिया। एक राजनीतिक रसूखदार  ने एक कमजोर परिवार की बेटी की अस्मिता को रौंद डाला। यह न केवल एक आपराधिक कृत्य था, बल्कि समूचे मानवीय मूल्यों पर सीधा प्रहार था। प्रशासन ने कार्यवाही की, गिरफ्तारी हुई परंतु न्यायिक प्रक्रिया की आड़ में वह पुनः बाहर आ गया। दुखद यह नहीं कि वह छूटा, बल्कि भयावह यह है कि बाहर आने के बाद समाज ने उस व्यक्ति को नायक के रूप में स्वीकार कर लिया। मंच, माला, सम्मान और यहां तक कि बच्चों को जीवन मूल्य सिखाने की भूमिका उसे सौंपी जा रही है। दूसरी घटना भी उससे कुछ दूरी पर स्थित एक अन्य कस्बे की है। वहां कुछ राजनीतिक और सामाजिक ओहदे वाले लोग जुए के अड्डे से पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए गए। परंतु जमानत के बाद वे फिर से समाज में सिर उठाकर घूम रहे हैं।

जिन्हें समाज में बहिष्कृत होना चाहिए, उन्हें आज गुलदस्ते, माला और पटाखों से सम्मानित किया जा रहा है। एक पीढ़ी जो सीखने की अवस्था में है, जब यह देखती है कि घिनौने कृत्य करने वाले लोग ही समाज के सिरमौर बन रहे हैं, तो वह क्या सीखेगी। क्या सत्य, ईमानदारी और नैतिकता केवल किताबों तक सीमित रह जाएंगे। हम धर्म और पुराणों की ओर देखें, तो स्पष्ट निर्देश हैं कि ऐसे व्यक्ति समाज में अपमानित किए जाएं। मनुस्मृति में उल्लेख है, अत्याचारिणं राजा दण्डयेत्तु यथाघ्नम्। अर्थात: अत्याचार करने वाले को उसके अपराध के अनुरूप दंडित करना चाहिए। गरुड़ पुराण में तो बलात्कारी के लिए नरक की कठोरतम यातनाएं बताई गई हैं कि यो बलान् मैथुनं कुर्याद् बाला वृद्धातथा यतिः। तं नरकं प्रापयेत् यावज्जन्मशतं ध्रुवम्।। यानि जो व्यक्ति बलपूर्वक स्त्री के साथ संबंध बनाता है, उसे सैकड़ों जन्म तक नरक में रहना पड़ता है।

महाभारत में द्रौपदी के चीरहरण प्रसंग में जब समाज के महान योद्धा मौन थे, तब कृष्ण का यह क्रोध आया था यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत…यानी जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म की वृद्धि होती है, तब सृष्टि को संतुलन में लाने के लिए ईश्वरीय हस्तक्षेप होता है। क्या हम उस स्तर की अधर्म की स्थिति में नहीं पहुंच चुके हैं। सबसे पीड़ादायक बात यह है कि इन घटनाओं के बाद समाज का बड़ा हिस्सा चुप रहा। क्या यह चुप्पी मौन समर्थन नहीं है। जब हम अन्याय देखकर भी प्रतिरोध नहीं करते, तब हम भी उस अपराध में भागीदार बन जाते हैं। कई बार यह भी देखने को मिलता है कि लोग कहते हैं हम क्या कर सकते हैं। यह दृष्टिकोण ही वह खतरनाक दरार है, जो पूरे सामाजिक ढांचे को गिरा सकती है।

यह बात स्पष्ट है कि ऐसे अपराधियों को राजनीतिक और सामाजिक संरक्षण प्राप्त है। उनके कार्यकर्ता उनके अपराध को प्रोपेगेंडा बनाकर दबाने की कोशिश करते हैं। मीडिया, जो कभी समाज का आईना माना जाता था, अब चुप्पी साध लेता है या पक्ष में खबरें चलाने लगता है। यह स्थिति और भी भयावह बन जाती है जब अपराधी सत्ता के करीब हो। यह कहना कि राजनीति विवश है, एक भ्रामक तर्क है। वास्तविकता यह है कि राजनीतिक दल और नेता ऐसे लोगों को संरक्षण इसलिए देते हैं क्योंकि वे भीड़ जुटा सकते हैं, धन दे सकते हैं और सत्ता निर्माण में सहयोग कर सकते हैं। राजनीति अब सेवा नहीं, सुविधा और समीकरण का खेल बन चुकी है। जहां मूल्य नहीं, बल्कि वोट और प्रभाव गिनती में आते हैं। यही कारण है कि ऐसे अपराधियों को मंच, माला और माइक सब कुछ मिल जाता है।

मैं चिंतित हूं कि हमारी आने वाली पीढ़ी इस विरोधाभास को कैसे समझेगी। एक ओर किताबों में राम, कृष्ण, गांधी और विवेकानंद का आदर्श और दूसरी ओर समाज में मंच पर बैठे बलात्कारी, लुटेरे और जुआरी आदर्श के रूप में प्रस्तुत हैं। यह द्वंद्व बच्चों के मन-मस्तिष्क में भ्रम पैदा करता है, और अंततः वे निष्कर्ष निकालते हैं कि जो ताकतवर है, वही सही है। समाज को अब मौन दर्शक नहीं, सजग प्रहरी बनना होगा। अपराधियों को सम्मानित करने की परंपरा बंद होनी चाहिए। आयोजकों, संस्थाओं, स्कूलों और सामाजिक मंचों को ऐसे व्यक्तियों को बुलाने से परहेज करना चाहिए जिनकी करनी समाज को कलंकित करती हो। धर्म, पुराण, न्याय और विवेक सभी का सम्मान तभी होगा जब हम व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से नैतिक साहस दिखाएं। यह समय केवल चिंता व्यक्त करने का नहीं, प्रतिरोध करने का है। यदि हम आज नहीं बोले, तो आने वाली पीढ़ी हमसे पूछेगी  कि जब अपराध मंच पर था, तुम कहां थे। यदि हम अभी नहीं चेते, तो वह दिन दूर नहीं जब अच्छाई को मंच की तलाश करनी पड़ेगी और बुराई मंचों से नैतिकता का भाषण देगी।

दुनिया बदलने के योग्य किस क्षमता को अपनाने की बात कह रहे वरिष्ठ पत्रकार डॉ नीरज गजेंद्र

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