छत्तीसगढ़ कमांडो की रिहाई की दिल दहलाने वाली स्टोरी: 40 नक्सली और हजारों ग्रामीणों के बीच हुई रिहाई…आखिर कमांडो की रिहाई की असल वजह जानिए….

रायपुर। बीजापुर में 3 अप्रैल को हुई मुठभेड़ के बाद बंधक बनाए गए कोबरा केकमांडो  राकेश्वर सिंह मनहास (Rakeshwar Singh Manhas) को पांच दिन बाद नक्सलियों ने आखिरकर रिहा कर दिया है. जवान की रिहाई के बाद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह (Amit Shah) ने उनसे फोन पर बातचीत कि और हाल जाना. इधर, कमांडो की रिहाई के बाद सूबे के पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह (Dr. Raman Singh) ने गर्वमेंट  पर निशाना साधा.  उन्होंने कहा कि गर्वमेंट 6 दिनों तक रणनीति ही बनाते रह गई. यह तो अच्छा हुआ कि जवान सकुशल रिहा हुआ. जवान की रिहाई से पूरा देश खुश है.

जवान ने रिहाई होने के बाद बताया कि खाना भी दिया सबकुछ दिया. अच्छा रहा इन लोगों ने छोड़ने को कहा था और आज छोड़ दिया. मुठभेड़ वाले दिन को याद करते हुए उन्होंने कहा कि ये तीन तारीख की बात है जिस दिन एनकाउंटर हुआ था. चार तारीख को मैं जंगल में भटकते हुए इनके चंगुल में फंसा था.  मैं उस समय बेहोश नहीं था, चार तारीख को मैं इनके चंगुल में फंसा था. मुझे नहीं पता कि कितने गांव में घुमाया गया. मेरी आंखों पर पट्टी बंधी रहती थी और हाथ भी बंधे रहते थे.

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जवान की एक तस्वीर भी जारी की

बतादें, बीजापुर के तर्रेम थाना क्षेत्र में बीते 3 अप्रैल को सुरक्षा बल और नक्सलियों के बीच भीषण मुठभेड़ हुई थी. इसमें सुरक्षा बल के 22 जवान शहीद हो 31 घायल हो गए थे. मुठभेड़ के बाद से ही सीआरपीएफ के राकेश्वर सिंह मनहास लापता थे. नक्सलियों ने 5 अप्रैल को एक प्रेस नोट जारी कर दावा किया था कि लापता जवान उनके कब्जे में है. इसके बाद उन्होंने बीते बुधवार को जवान की एक तस्वीर भी जारी की.

बीजापुर जिले के जोनागुड़ा गांव से और 15 किलोमीटर भीतर के क्षेत्र में CRPF के कोबरा कमांडो राकेश्वर को रखा गया था। गुरुवार की दोपहर उन्हें प्रशासन की तरफ से तय मध्यस्थों और पत्रकारों की एक टीम के हवाले कर दिया गया। पांच दिनों से नक्सलियों के कब्जे में रहे कमांडो को जब नक्सली छोड़ रहे थे, वहां करीब 40 नक्सली मौजूद थे। आस-पास के 20 गांव के लोगों को बुलाया गया था। इन सबके बीच जवान को छोड़ा गया। जब कमांडो की रिहाई हो रही थी तो बीजापुर और सुकमा के पत्रकार गणेश मिश्रा, राजन दास, मुकेश चंद्राकर, युकेश चंद्राकर, शंकर और चेतन वहां मौजूद थे।

पत्रकारों की दल में शामिल पत्रकार मुकेश चंद्राकर ने बताया कि हमें जोनागुड़ा आने के लिए कहा गया था। भीषण गर्मी उबड़-खाबड़ रास्तों से होते हुए हम जोनागुड़ा दोपहर तक पहुंचे। बीजापुर जिला मुख्यालय से ये जगह करीब 80 से 85 किलोमीटर दूर है। यहां पहुंचने के बाद और करीब 15 किलोमीटर भीतर हम गए। और करीब दो से तीन घंटे के तनाव भरे माहौल के बाद कमांडो राकेश्वर को छोड़ा गया। शाम 5 से 6 बजे के करीब हम जवान को तर्रेम थाना लेकर आए। उन्हें Police और CRPF के हवाले किया गया।

पत्रकारों की जुबानी…

नक्सलियों ने गर्वमेंट से डिमांड रखी थी कि निष्पक्ष मध्यस्थों के पेश करें, हम जवान को छोड़ देंगे। जवान की रिहाई के लिए गए पत्रकार युकेश ने बताया कि वहां 20 गांवों के लगभग 2 हजार लोगों की भीड़ थे। ये देखकर हम डर गए थे। क्योंकि वहां कुछ भी हो सकता था। नक्सली लोगों पत्रकारों और मध्यस्थों पर नजर बनाए हुए थे। मध्यस्थों के पहुंचते ही जवान को नहीं लाया गया। माओवादियों ने पहले पूरे माहौल को भांपा और इसके बाद जंगल की तरफ कुछ हलचल दिखी। करीब 35 से 40 हथियार बंद नक्सली कमांडो राकेश्वर को लेकर लोगों के बीच आए।

जवान के बदले एक ग्रामीण छोड़ना पड़ा Police  को

Police  के आला अफसरों ने एक अहम जानकारी इस पूरी रिहाई के केस में छुपा रखी थी। सूत्रों dsके अनुसार, नक्सलियों के पास जाने से पहले ही मध्यस्थों को कुंजाम सुक्का नाम का ग्रामीण सौंपा गया था। ये ग्रामीण मुठभेड़ वाली जगह से हिरासत में लिया गया था। माओवादियों ने जवान को रिहा करने से पहले मध्यस्थों से पूछा कि वो ग्रामीण कहां है। तो मध्यस्थों ने कहा कि हम उसे साथ लेकर आए हैं। उस ग्रामीण को गांव वालों के सामने नक्सलियों को सौंपा गया। इसके बदले जवान को माओवादियों  ने रिहा किया।

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पत्रकार युकेश और राजन ने बताया कि जवान को छोड़ने के वक्त शाम को करीब 4 बजे के आस-पास पूरे ग्रामीण आक्रोशित हो गए थे। गांव के लोगों ने माओवादियों से कहना शुरू कर दिया था कि जवान को छोड़कर वो गलती कर रहे हैं, इसे मत छोड़ो, रिहा मत करो। बढ़ते हंगामा देख मध्यस्थों के साथ पत्रकार मोटरसाईकिल में सवार होकर निकल गए।

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