बड़ी खबर: वैज्ञानिकों ने साक्षर किया नई मछली के जीवाश्म का अद्वितीय खोज
उत्तरी भारत में उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले से वैज्ञानिकों ने ताजगी से भरे पानी की मछलियों के जीवाश्म खोज निकाले हैं। यह खोज न केवल भारत में पहली बार हो रही है, बल्कि यह पूरे विश्व में इस प्रकार के केवल दूसरे जीवाश्म माने जाते हैं।
जीवाश्मों की महत्वपूर्ण खोज
विज्ञानियों के एक समूह ने, जिसमें वारिदा इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. निंथौजाम प्रेमजीत सिंह का नेतृत्व था, सहारनपुर के मोहंड में एक अध्ययन किया। यहां पाइनोजीन काल (लगभग 5 मिलियन साल पहले) के समय के ताजे पानी की मछलियों के पहला जीवाश्म मिले हैं। इनमें से कुछ जीवाश्म ओटोलिथ्स हैं, जो सुनने और संतुलन बनाए रखने के लिए कैल्शियम कार्बोनेट की संरचनाएं होती हैं।
इस अध्ययन में दिखाया गया है कि गॉरामी, स्नेकहेड और गोबी जैसी मछलियों का अस्तित्व उस समय में था, जो भोजन श्रृंखला को दर्शाता है। छोटे मछलियां शिकार और स्नेकहेड मछलियां शिकारी थीं।
अध्ययन के महत्वपूर्ण परिणाम
डॉ. सिंह का कहना है कि ये जीवाश्म पहले सुमात्रा में मिले थे, लेकिन वहां के जीवाश्मों की उम्र संदिग्ध है। हमारे द्वारा किए गए अध्ययन में मोहंड में मिले जीवाश्म 4.8 मिलियन साल पुराने हैं। शोध के अनुसार, शिवालिक समूह, जो 18.3 से 0.22 मिलियन साल पुराने हैं, हिमालय के तलहटी में फैला हुआ है।
शोध पत्र में बताया गया है कि यह क्षेत्र पिछले काल में स्थिर ताजे पानी के जलाशय से भरा हुआ था, जो घनघोर वनस्पति से घिरा हुआ था। यह ओस्फ्रोनमिडे परिवार की मछलियों के अस्तित्व को दिखाता है, जो शांत पानी को पसंद करती हैं।
प्राचीन पारिस्थितिकी तंत्र की पुनर्रचना
शोध में पाया गया है कि शिवालिक क्षेत्र में ताजे पानी की मछलियों के खोज बहुत दुर्लभ हैं। डॉ. सिंह और उनके सहयोगियों ने पहले भी इस क्षेत्र में कुछ मछलियों के जीवाश्मों की पहचान की थी। हालांकि, पिछले कई वर्षों में ताजे पानी के जीवाश्मों के रिकॉर्ड में कोई महत्वपूर्ण वृद्धि नहीं हुई है।
हालांकि, अध्ययन से मिली जानकारी प्राचीन ताजे पानी के पारिस्थितिकी तंत्र की पुनर्रचना में मददगार सिद्ध होगी। भविष्य में और भी जीवाश्मों की खोज की जा सकती है, जिससे वैज्ञानिकों को मछलियों के वितरण और उनके पारिस्थितिकी तंत्र को बेहतर समझने का अवसर मिलेगा।
यह अध्ययन निश्चित रूप से भारत में प्राचीन जैव विविधता के चित्रण में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित होगा।
