वरिष्ठ पत्रकार डॉ. नीरज गजेंद्र की दृष्टि वाली सीढ़ी, जो बुद्धू को भी बुद्धत्व तक पहुँचा देती है

web morcha
डॉ. नीरज गजेंद्र
Dr. Neeraj Gajendra

जिस प्रकार एक तोता वही बोलता है जो हम उसे सिखाते हैं। राम सिखाओ तो राम। श्याम सिखाओ तो श्याम। क्योंकि उसमें अनुभूति नहीं, केवल अनुकरण है। उसी तरह पशु वही करता है जो उसे सीखाया जाए। पर मनुष्य पशु नहीं है। वह कोई वीणा, सारंगी या मृदंग भी नहीं है कि जिसे बजाया जाए तो सुर निकले पर वह खुद अपनी ही ध्वनि को न सुन सके। मनुष्य में अनुभूति है। चेतना है।  भीतर एक ऐसा नाद है, जिसे अनाहत नाद कहा गया जो बाहर के शोर से नहीं, भीतर की गहन शांति से उत्पन्न होता है। यही अनुभूति बुद्ध की तरह मनुष्य को ज्ञान की ओर ले जाती है। लेकिन दुख की बात यह है कि आज अधिकतर लोग जीवन भर बाहर-बाहर भटकते रहते हैं। कोई सुख की खोज में, कोई सम्मान की, कोई कामयाबी की और कोई किसी चमत्कार की। वह सोचता है कि नया स्थान, नया गुरु, नई किताब, नया तरीका, इनसे उसे वह सत्य मिल जाएगा जिसकी वह तलाश में है। लेकिन अंत में वही होता है लौटके बुद्धू घर को आए अर्थात लौटकर वहीं पहुंचना पड़ता है, जहां से तत्वज्ञान की पहली किरण उभर सकती थी।

असल में बुद्ध और बुद्धू दोनों की यात्रा एक ही स्थान से शुरू होती है। फर्क केवल इतना होता है कि बुद्ध बाहर नहीं, भीतर खोजते हैं। सिद्धार्थ वर्षों तक जंगलों में भटके, कठोर तप किए, अनेक गुरुओं से सीखा, लेकिन ज्ञान उन्हें तब मिला जब वे शांत होकर अपनी ही चेतना के भीतर झांकने लगे। वे लौटे तो सिद्धार्थ नहीं रहे, बुद्ध हो चुके थे। यही रहस्य उपनिषदों ने भी बताया गया है कि आत्मानं विद्धि अर्थात स्वयं को जानो। कठोपनिषद में नचिकेता से यम कहते हैं कि सत्य बाहर मिलने वाली वस्तु नहीं, वह भीतर जागने वाली ज्योति है। आज के आधुनिक दौर में अध्यात्म का मार्ग कोई कठिन साधना नहीं, जीवन जीने की एक संतुलित कला है। यह रोज दस मिनट शांत बैठने से शुरू होता है। अनाहत नाद, जिसका उल्लेख योगशास्त्र में है, वह कोई रहस्यमय ध्वनि नहीं बल्कि मन की वह अनुभूति है जो तब सुनाई देती है जब व्यक्ति बाहरी आवाजों से मुक्त होकर खुद को सुनता है। यही अनुभूति ज्ञान की पहली सीढ़ी है। यही वह क्षण है जहां बुद्धू का मार्ग बुद्ध की दिशा में मुड़ जाता है।

मनुष्य को ज्ञान पाने के लिए बड़े-बड़े सिद्धांतों या कठिन तपस्याओं की आवश्यकता नहीं। आवश्यकता केवल एक बात की है वह बाहर की आवाजों से थोड़ा हटकर भीतर की आवाज को सुने। अनुकरण कम और अनुभव अधिक करे। भटकने से ज्यादा ठहरने की कोशिश करे। प्रश्नों से ज्यादा आत्मसंवाद करे। यही सरल कदम मनुष्य को बुद्धू से बुद्ध की यात्रा पर ले चलकर मंजिल तक पहुंचाता है। सत्य हमेशा भीतर था, भीतर है और भीतर ही मिलेगा। जिसने यह जान लिया, उसने स्वयं को पहचान लिया। यही ज्ञान है, यही मुक्ति है और यही आनंद है।

डॉ. नीरज गजेंद्र किसके आचरण में धर्म खोज रहे हैं, जानिए यहां-

ये भी पढ़ें...

नुआपाड़ा उपचुनाव: EVM बदलने के आरोपों

नुआपाड़ा उपचुनाव: EVM बदलने के आरोपों पर बोले मुख्य निर्वाचन अधिकारी, “प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी, अफवाहों पर विश्वास न करें”

#DrNeerajGajendra #Editorial #IdealSociety #RamRajya #SpiritualPerspective #IndianPhilosophy #SocialHarmony #WebMorchaneerajSenior journalist Dr. Neeraj Gajendra
नुआपाड़ा उपचुनाव

नुआपाड़ा उपचुनाव: वोटिंग कल, सभी तैयारियां पूरी, 8 संवेदनशील बूथों पर हेलिकॉप्टर से पहुंचेगी पोलिंग टीम, माओवादी क्षेत्र में हाई अलर्ट

#DrNeerajGajendra #Editorial #IdealSociety #RamRajya #SpiritualPerspective #IndianPhilosophy #SocialHarmony #WebMorchaneerajSenior journalist Dr. Neeraj Gajendra
[wpr-template id="218"]