नई दिल्ली/लंदन। इस वक्त जहां दुनिया के कई देश कड़ाके की ठंड से जूझ रहे हैं, वहीं भविष्य को लेकर एक बेहद डराने वाली तस्वीर सामने आई है। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की एक नई रिसर्च रिपोर्ट में आने वाले दशकों में पड़ने वाली अत्यधिक और जानलेवा गर्मी को लेकर गंभीर चेतावनी दी गई है। रिपोर्ट के अनुसार, भविष्य में धरती के कई हिस्सों में तापमान इतना बढ़ सकता है कि मानव शरीर के लिए उसे सहन करना मुश्किल हो जाएगा। इस रिपोर्ट में भारत को भी सबसे ज्यादा जोखिम वाले देशों में शामिल किया गया है।
2050 तक 40% आबादी पर खतरा
रिपोर्ट में बताया गया है कि अगर मौजूदा हालात रहे तो 2050 तक दुनिया की करीब 40 प्रतिशत आबादी, यानी लगभग 4 अरब लोग, ऐसी गर्मी का सामना करेंगे जो इंसानी शरीर की सहनशक्ति से बाहर होगी। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह केवल मौसम की समस्या नहीं होगी, बल्कि यह स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा और जीवन प्रणाली को गहराई से प्रभावित करेगी।
भारत के लिए ‘रेड अलर्ट’
ऑक्सफोर्ड के वैज्ञानिकों ने भारत के लिए विशेष रूप से रेड अलर्ट जारी किया है। अध्ययन के मुताबिक, भारत, नाइजीरिया और इंडोनेशिया जैसे देश उन इलाकों में शामिल होंगे जहां गर्मी का सबसे भयावह रूप देखने को मिल सकता है। अनुमान है कि आने वाले वर्षों में कई क्षेत्रों में तापमान 45 से 50 डिग्री सेल्सियस या उससे भी अधिक पहुंच सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इतनी अधिक गर्मी में इंसानी शरीर अपने आंतरिक अंगों को ठंडा रखने में असफल हो सकता है, जिससे हीट स्ट्रोक और मौत का खतरा तेजी से बढ़ेगा। भारत की बड़ी आबादी के पास एयर कंडीशनिंग या ठंडक के पर्याप्त साधन नहीं हैं, जिससे हालात और गंभीर हो सकते हैं।
गर्मी से मौतों में तेज़ बढ़ोतरी की आशंका
रिपोर्ट में बताया गया है कि वर्ष 2010 में जहां करीब 1.5 अरब लोग अत्यधिक गर्मी के खतरे वाले क्षेत्रों में रहते थे, वहीं 2050 तक यह संख्या बढ़कर 3.8 अरब तक पहुंच सकती है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि आने वाले दशकों में गर्मी से होने वाली मौतों का आंकड़ा कई गुना बढ़ सकता है।
ठंडे देश भी नहीं रहेंगे सुरक्षित
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि रूस, कनाडा और फिनलैंड जैसे ठंडे माने जाने वाले देश भी सुरक्षित नहीं रहेंगे। इन देशों के घर और इमारतें ठंड को रोकने के लिए डिज़ाइन की गई हैं। तापमान बढ़ने की स्थिति में ये इमारतें अत्यधिक गर्मी को फंसाने वाली संरचनाओं में बदल सकती हैं। साथ ही, वहां का परिवहन और स्वास्थ्य ढांचा भी भीषण गर्मी से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार नहीं है।
खेती, शिक्षा और स्वास्थ्य पर पड़ेगा असर
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की रिसर्चर राधिका खोसला के अनुसार, यदि वैश्विक तापमान वृद्धि 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा को पार कर जाती है, तो इसका सीधा असर कृषि, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ेगा। फसलें या तो अत्यधिक गर्मी से जल जाएंगी या पानी की कमी से सूख जाएंगी, जिससे खाद्य संकट और भूखमरी का खतरा बढ़ेगा।
बढ़ सकता है पलायन का संकट
रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि अत्यधिक गर्मी के कारण करोड़ों लोग रहने लायक जगहों की तलाश में पलायन करने को मजबूर हो सकते हैं। इससे शहरी इलाकों पर दबाव बढ़ेगा और सामाजिक-आर्थिक समस्याएं और गंभीर हो सकती हैं।
समाधान की जरूरत
वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर अभी से जलवायु परिवर्तन को रोकने के ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियों को इसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़ेंगे। नवीकरणीय ऊर्जा, हरित तकनीक और टिकाऊ जीवनशैली ही इस संकट से निपटने का रास्ता हो सकती है।




















