
प्रकृति ने मनुष्य को अद्भुत चेतना से नवाजा है, पर विडंबना यह है कि वही मनुष्य जीवन भर उस चीज की तलाश में भटकता रहता है जो उसके भीतर पहले से ही मौजूद होती है। यह कथा जितनी पुरानी है, उतनी ही आधुनिक भी। एक मृग की तरह, जो कस्तुरी की सुगंध पाकर उसे बाहर ढूंढ़ता फिरता है। मनुष्य भी अपनी खुशी, शांति और संतोष की खोज बाहरी दुनिया में करता रहता है। लेकिन कस्तुरी सदैव भीतर होती है, बाहर नहीं। शास्त्र कहता है कि यह सत्य मृत्यु-शैया पर पहुंचकर तो समझ आता है, पर तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। भटकाव का यह चक्र मनुष्य के जीवन का सबसे बड़ा भ्रम है। आधुनिक समय में यह भ्रम और गहरा हो गया है। डिजिटल युग ने उपलब्धियों को एक दौड़ में बदल दिया है। कौन कितना सफल, कौन कितना धनी, कौन कितना लोकप्रिय। सोशल मीडिया ने एक नया भ्रम पैदा किया है कि जीवन वैसे ही होना चाहिए जैसा दूसरों की पोस्ट में दिखता है। नतीजा यह कि व्यक्ति वास्तविक जीवन से अधिक काल्पनिक जीवन का पीछा करने लगता है।
अध्यात्म कहता है कि वास्तविक जीवन भीतर है, बाहर नहीं। उपनिषदों में बार-बार कहा गया है तत्त्वमसि अर्थात तू वही है जिसे तू खोज रहा है। लेकिन मनुष्य इस सत्य को तब समझता है जब उसने जीवन की लगभग सारी ऊर्जा बाहर तलाशने में खर्च कर दी होती है। कई लोग कहते हैं कि जीवन के अंत में आकर उन्हें समझ आता है कि शांति किसी वस्तु, व्यक्ति या उपलब्धि में नहीं, अपने ही भीतर थी। परंतु तब तक शरीर थक चुका होता है, समय बीत चुका होता है और मन की सीख जीवन में उपयोग नहीं हो पाती। विज्ञान भी यही कहने लगा है। सकारात्मक मनोविज्ञान के शोध बताते हैं कि मनुष्य की वास्तविक प्रसन्नता बाहरी साधनों से सिर्फ 10 फीसदी तक प्रभावित होती है। 40 प्रतिशत खुशी व्यक्ति की अपनी मानसिक स्थिति, आदतें, दृष्टिकोण और विचारों से और बाकी 50 प्रतिशत आनुवंशिक कारकों से आती है। इसका अर्थ यह है कि बाहरी वस्तुओं और परिस्थितियों में सुख ढूंढ़ना उतना ही मूर्खतापूर्ण है जितना मृग का अपनी ही नाभि में छिपी कस्तुरी को जंगल में ढूंढ़ना।
मनुष्य के भीतर स्थित यह कस्तुरी क्या है। यह उसकी क्षमता, उसकी मूल प्रकृति, उसका आत्मबोध, उसकी चेतना और उसकी विशिष्टता है। हर व्यक्ति का एक अद्वितीय मानसिक और आध्यात्मिक ढांचा होता है, जिसमें उसकी प्रतिभा, सोच, आकांक्षाएं और उसके मूल्य समाए होते हैं। लेकिन आधुनिक समाज व्यक्ति को स्वयं होने का अवसर नहीं देता। उसे एक तयशुदा ढांचे में ढालने की कोशिश करता है और व्यक्ति जितना अधिक बाहरी ढंग से ढलता है, उतना ही भीतर का सत्य धुंधला होता जाता है। आध्यात्मिक परंपराएं आत्म-अवलोकन को जीवन की पहली सीढ़ी मानती हैं। बुद्ध ने कहा था अप्प दीपो भव। यानी स्वयं अपना दीपक बनो। लेकिन मनुष्य दूसरे दीपकों की रोशनी में चलने का आदी हो जाता है। यही कारण है कि जब उम्र ढलती है, जीवन की गति धीमी होती है, तो भीतर की आवाज सुनाई देने लगती है। यही वह क्षण होता है जब व्यक्ति कहता है जो मैं ढूंढ रहा था, वह मेरे भीतर ही था। लेकिन जीवन की उलझनों और दौड़ ने उसे यह देखने का अवसर ही नहीं दिया।
इस खोज का मार्ग कठिन नहीं, स्पष्ट है। आधुनिक मनोविज्ञान में इसे self-realization और inner alignment कहा जाता है। अध्यात्म इसे आत्मज्ञान कहता है। सत्य यह है कि मनुष्य को वह सब कुछ नहीं मिलेगा जो वह चाहता है, लेकिन उसे वह अवश्य मिलेगा जो उसके भीतर है। और जो भीतर है, वही वास्तव में उसका अपना है। बाहर की यात्रा कभी समाप्त नहीं होती, पर भीतर की यात्रा मुक्ति देती है। इसलिए जरूरी है कि व्यक्ति जीवन के किसी भी मोड़ पर यह पहचान ले कि कस्तुरी की खोज बाहर नहीं, भीतर करनी है। यही आत्मज्ञान का प्रारंभ और यही जीवन की पूर्णता है ।
जो भाग्य में नहीं वह कैसे मिलेगा, बता रहे वरिष्ठ पत्रकार डॉ. नीरज गजेंद्र




















