
महाभारत के शांतिपर्व में भीष्म पितामह युधिष्ठिर से कहते हैं कि राजा प्रजा के सुख के लिए होता है, स्वयं के सुख के लिए नहीं। यह कोई साधारण वाक्य नहीं, शासन का कालातीत सिद्धांत है। यहां स्पष्ट होता है कि व्यक्तिगत धर्म तब तक ही मूल्यवान है जब तक वह लोकधर्म से नहीं टकराता। जनप्रतिनिधि का आचरण निजी नहीं होता, वह पूरे समाज की दिशा निर्धारित करता है। लेकिन आज का समय विचलित करने वाला है। जहां भी दृष्टि डालिए, उन्माद की चिंगारियां सुलगती दिखती हैं। सत्ता प्राप्ति और सत्ता बचाने की होड़ ऐसी है कि मूल्य, मर्यादा और नैतिकता धुएं की तरह उड़ते प्रतीत होते हैं।
राजनीति सेवा का माध्यम कम और शक्ति प्रदर्शन का मंच अधिक बनती जा रही है। सब जगह अविश्वास, बेचैनी और ध्रुवीकरण बढ़ रहा है। ऐसे दौर में यह प्रश्न अनिवार्य है कि क्या सत्तासीन अपने कर्तव्य के प्रति उतने ही जवाबदेह हैं, जितने उन्हें होना चाहिए। धर्म, अध्यात्म और नीति-शास्त्र बार-बार याद दिलाते हैं कि सत्ता का सर्वोच्च धर्म, राजधर्म है। यह स्वधर्म से भी ऊंचा होता है। राजधर्म कोई दार्शनिक कल्पना नहीं, सत्ता की सार्थकता को समझाने वाला सीधा-सादा कर्तव्यबोध है। वह जिम्मेदारी जिसे शासक जनता के विश्वास के साथ स्वीकार करता है।
रामायण में राजधर्म का अद्भुत उदाहरण मिलता है। श्रीराम व्यक्तिगत सुख और पारिवारिक संबंधों का त्याग कर देते हैं क्योंकि उनके लिए जनता का विश्वास सर्वोपरि है। राम का वनवास स्वधर्म नहीं, राजधर्म था। इतिहास और पुराण साक्षी हैं कि राज्य तभी सुरक्षित रहता है जब शासक अपनी शक्ति को संयम में रखे और निर्णय को न्यायपरक बनाए। महाभारत युद्ध के उपरांत कृष्ण कहते हैं कि सत्ता का उद्देश्य विजय नहीं, धर्म की स्थापना और लोकहित की साधना है। यही राजधर्म के तीन मूल स्तंभ न्याय, करुणा और निष्पक्षता में निहित है। इनमें से किसी एक से भी समझौता करना सत्ता की नींव को कमजोर कर देता है। इसी कारण हमारे संवैधानिक ढांचे में भी जनप्रतिनिधि को जनसेवक कहा गया है। सत्ता सेवा, शासन उत्तरदायित्व और नेतृत्व त्याग मांगता है। यह सिद्धांत सदैव प्रासंगिक रहता है, चाहे तंत्र कोई भी हो।
गीता यह नहीं सिखाती कि धर्म का उपयोग किसी समुदाय की श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए किया जाए। वह कहती है कर्तव्य को निष्पक्ष भाव से निभाओ, फल के मोह से परे रहकर। यही राजधर्म की मूल आत्मा है। लोकतंत्र में यह बात और गहरी हो जाती है क्योंकि यहां सत्ता जनता के मत से बनती है और संविधान उसके आचरण की मर्यादा निर्धारित करता है। धर्मनिरपेक्षता धर्म-विरोध नहीं, सभी विश्वासों के प्रति समान न्याय है। राजधर्म वह दर्पण है जिसमें सत्ता का असली चरित्र दिखता है। जो शासक धर्म के बाहरी प्रदर्शन में नहीं, उसके सार को आचरण में उतारता है, वही आदरणीय नेता बनता है। अशोक ने कलिंग युद्ध के बाद समझा कि हिंसा सत्ता की शक्ति नहीं, उसकी कमजोरी है, और धम्म को शासन का केंद्र बनाकर महान कहलाए। आज जब राजनीति में भाषा की मर्यादा टूट रही है। भीड़ भावनाओं से संचालित होती जा रही है। स्वहित जनहित को निगलने लगा है, तब राजधर्म की बात आदर्शवाद नहीं, आवश्यकता है। समाज को बचाने, उसकी व्यवस्था को स्थिर रखने और भविष्य को सुरक्षित करने के लिए राजधर्म ही वह ऊर्जा है जो सत्ता को दिशा देता है। राजधर्म भूलते ही सत्ता अराजकता का कारण बन जाती है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि सत्तासीन धर्म के बाहरी शोर के बजाय उसके भीतर छिपे अनुशासन और आत्मनियंत्रण को अपनाएं। कबीर कहते हैं कि मन ना रंगाए, रंगाए जोगी कपड़ा। असली धर्म आचरण में दिखता है, प्रदर्शन में नहीं। जनता सत्ता को सिर्फ अधिकार नहीं, भरोसा सौंपती है। यह भरोसा अमूल्य है, और इसे संवेदनशीलता, न्याय और निष्पक्ष कर्म से ही लौटाया जा सकता है। राजधर्म का पालन करने वाला नेतृत्व अपने विरोधियों को भी सुरक्षा देता है। धर्म का उपयोग यदि शक्ति प्रदर्शन के बजाय मानवीय मूल्यों को जगाने में हो, तभी सत्ता सार्थक होती है। सत्ता यदि वास्तव में आज धर्म की रक्षा करना चाहती है, तो उसे सबसे पहले राजधर्म का पालन करना होगा। वह भी निस्वार्थ भाव, निष्पक्षता और लोककल्याण की अटल प्रतिबद्धता के साथ। समय कह रहा है स्वधर्म व्यक्ति को ऊँचा उठाता है, और राजधर्म पूरी सभ्यता को बचा सकता है।
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