Homeछत्तीसगढ़कांग्रेस सरकार की तर्ज पर पंचायत में भी ‘ढाई-ढाई साल’ का फॉर्मूला!

कांग्रेस सरकार की तर्ज पर पंचायत में भी ‘ढाई-ढाई साल’ का फॉर्मूला!

– कोमाखान में उपसरपंच पद को लेकर हुआ अनोखा समझौता, हिरेंद्र उपाध्याय और हुमेश यादव आधे-आधे कार्यकाल के लिए करेंगे नेतृत्व

महासमुंद। छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार में ‘ढाई-ढाई साल का सत्ता साझेदारी फॉर्मूला भले ही धराशायी हो गया हो, लेकिन अब इसकी छाप ग्रामीण राजनीति में दिखने लगी है। महासमुंद जिले के कोमाखान ग्राम पंचायत में ऐसा ही दिलचस्प मामला सामने आया, जहां उपसरपंच पद को लेकर ‘समझौते की राजनीति’ देखने को मिली।

8 मार्च को हुए पंचायत चुनाव में हिरेन्द्र उपाध्याय निर्विरोध उपसरपंच चुने गए, लेकिन इसके साथ ही नवनिर्वाचित पंच हुमेश यादव को भी बराबरी का सम्मान दिया गया। दरअसल, यहां गुप्त समझौता हुआ कि हिरेन्द्र उपाध्याय पहले ढाई साल उपसरपंच रहेंगे, और फिर शेष कार्यकाल के लिए हुमेश यादव पद संभालेंगे। ग्रामीण राजनीति में यह ‘सत्ता का बंटवारा’ चर्चा का विषय बन गया है।

– गांव की सियासत में कांग्रेस मॉडल की झलक

राज्य की राजनीति में ढाई-ढाई साल का सत्ता फॉर्मूला 2018 के विधानसभा चुनावों के बाद देखने को मिला था। मुख्यमंत्री पद के लिए भूपेश बघेल और टीएस सिंहदेव के बीच समझौता हुआ था कि पहले ढाई साल भूपेश बघेल मुख्यमंत्री रहेंगे और फिर सत्ता टीएस सिंहदेव को सौंपी जाएगी। हालांकि, यह फॉर्मूला कांग्रेस सरकार में सफल नहीं हुआ और टीएस सिंहदेव को इंतजार ही करना पड़ा। अब यही प्रयोग पंचायत स्तर पर होता दिख रहा है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ‘बंटवारे की राजनीति’ की यह नई परंपरा लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत हो सकती है। पंचायत स्तर पर भी यदि सत्ता के लिए समझौते होने लगे, तो क्या यह भविष्य में ‘राजनीतिक लाभ के लिए साठगांठ’ का रास्ता खोल सकता है।

समझौते की बुनियाद पर निर्विरोध चुनाव!

कोमाखान ग्राम पंचायत में निर्वाचित पंचों ने सर्वसम्मति से हिरेन्द्र उपाध्याय को उपसरपंच चुना, जिसमें मनोज चौधरी, ज्योति हेमंत ठाकुर, लक्ष्मी ठाकुर, नाजीरा खान, त्रिवेणी सिंह ठाकुर, शबनम बानो, जितेन्द्र कुमार खरे, शकुंतला देवांगन चंद्राकर, हुमेश यादव, अनीता सुनील जैन, खेमराज जैन, संध्या यादव और उमा सोनी शामिल हैं।

– पंचायत चुनावों की नई दिशा

पंचायत चुनावों में सत्ता साझेदारी के इस ‘नए ट्रेंड’ ने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है। कुछ इसे आपसी सहमति और भाईचारे की राजनीति कह रहे हैं, तो कुछ इसे गांवों में राजनीतिक जोड़तोड़ की शुरुआत मान रहे हैं।

अब देखना यह होगा कि क्या यह समझौता सफल होगा या फिर राज्य की राजनीति की तरह यह भी केवल ‘कहने भर’ का रहेगा।

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