बिलासपुर। साल 2003 के चर्चित रामावतार जग्गी हत्याकांड में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए ट्रायल कोर्ट के पुराने निर्णय को पलट दिया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा की डिवीजन बेंच ने सीबीआई की अपील (ACQA No. 66/2026) मंजूर करते हुए अमित जोगी को दोषी ठहराया है।
अदालत ने अमित जोगी को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 (हत्या) और 120-बी (अपराधिक साजिश) के तहत दोषी मानते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। इसके साथ ही 1,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है। जुर्माना नहीं भरने की स्थिति में छह महीने की अतिरिक्त सश्रम कैद का प्रावधान रखा गया है।
ट्रायल कोर्ट के फैसले को किया निरस्त
हाईकोर्ट ने 31 मई 2007 को रायपुर की विशेष अदालत द्वारा दिए गए फैसले को पूरी तरह खारिज कर दिया। उस समय अदालत ने सबूतों के अभाव में अमित जोगी को बरी कर दिया था, जबकि अन्य 28 आरोपियों को दोषी करार देते हुए सजा सुनाई गई थी।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि एक ही साक्ष्य के आधार पर कुछ आरोपियों को दोषी ठहराना और कथित मुख्य साजिशकर्ता को बरी करना न्यायसंगत नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर खुला मामला
यह मामला सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद दोबारा खोला गया था। इसके बाद हाईकोर्ट में सुनवाई हुई और अब यह महत्वपूर्ण फैसला सामने आया है।
2003 में हुई थी हत्या
4 जून 2003 को एनसीपी नेता रामावतार जग्गी की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस केस में कुल 31 लोगों को आरोपी बनाया गया था, जिनमें से दो लोग—बल्टू पाठक और सुरेंद्र सिंह—सरकारी गवाह बन गए थे।
2007 में ट्रायल कोर्ट ने अमित जोगी को बरी कर दिया था, जिसके खिलाफ मृतक के बेटे सतीश जग्गी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को हाईकोर्ट को सौंप दिया।
कौन थे रामावतार जग्गी
रामावतार जग्गी कारोबारी पृष्ठभूमि से जुड़े थे और पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल के करीबी माने जाते थे। जब शुक्ल ने कांग्रेस छोड़कर एनसीपी जॉइन की, तो जग्गी भी उनके साथ चले गए थे। बाद में उन्हें छत्तीसगढ़ में एनसीपी का कोषाध्यक्ष बनाया गया।
अन्य दोषी आरोपी
इस हत्याकांड में अभय गोयल, याहया ढेबर, वीके पांडे, फिरोज सिद्दीकी, राकेश चंद्र त्रिवेदी, अवनीश सिंह, सूर्यकांत तिवारी, अमरीक सिंह गिल, चिमन सिंह, सुनील गुप्ता समेत कई अन्य आरोपियों को पहले ही दोषी ठहराया जा चुका है।
