महासमुंद/बागबाहरा। मिड-डे मील संकट: छत्तीसगढ़ में नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत को चार दिन बीत चुके हैं, लेकिन जिले के कई प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों में अब तक मध्यान्ह भोजन व्यवस्था पूरी तरह पटरी पर नहीं लौट पाई है। ऐसे में कई स्कूलों में बच्चों का स्वागत बिस्कुट और मुर्रा (लाई) देकर किया जा रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों के अभिभावकों में इसे लेकर चिंता बढ़ने लगी है।
स्कूल प्रबंधन का कहना है कि खाद्यान्न की उपलब्धता में कोई समस्या नहीं है, लेकिन रसोइयों द्वारा काम बंद किए जाने के कारण मध्यान्ह भोजन शुरू नहीं हो पा रहा है।
वेबमोर्चा की टीम ने बागबाहरा विकासखंड के विभिन्न विद्यालयों में मध्यान्ह भोजन व्यवस्था की पड़ताल की। इस दौरान प्राथमिक शाला चंदरपुर, खट्टा, चंदरपुर, पटपरपाली, साल्हेभाठा, डोगाखम्हरिया और बैगाखम्हरिया का जायजा लिया गया। जांच में सामने आया कि चंदरपुर, खट्टा, चंदरपुर और पटपरपाली में मध्यान्ह भोजन बंद है, जबकि साल्हेभाठा के प्राथमिक एवं माध्यमिक विद्यालयों में भोजन व्यवस्था सुचारू रूप से संचालित हो रही है।

रसोइया संघ की मांगों से जुड़ा है मामला
प्राथमिक शाला खट्टा के शिक्षकों ने मध्यान्ह भोजन बंद होने के पीछे एक वायरल ज्ञापन का हवाला दिया। यह ज्ञापन छत्तीसगढ़ स्कूल मध्यान्ह भोजन रसोइया कल्याण संयुक्त संघ द्वारा लोक शिक्षण संचालनालय को सौंपा गया है। ज्ञापन में रसोइयों ने छह प्रमुख मांगें रखी हैं, जिनमें 16 जून से 30 जून तक का मानदेय भुगतान, कलेक्टर दर पर वेतन, स्थायीकरण तथा समूहों के माध्यम से रसोइयों को नहीं हटाने की मांग शामिल है।
संघ ने चेतावनी दी है कि यदि 16 जून से 30 जून तक के कार्य का मानदेय नहीं दिया गया तो रसोइये मध्यान्ह भोजन बनाने का कार्य बंद कर देंगे। इसी मांग को लेकर कई स्थानों पर रसोइयों ने काम करने से इनकार कर दिया है, जिसका सीधा असर स्कूलों की भोजन व्यवस्था पर पड़ा है।

शिक्षकों ने निकाला समाधान, जेब से दे रहे पारिश्रमिक
रसोइया संघ का कहना है कि 16 जून से 30 जून तक के कार्य के लिए शासन से उन्हें मानदेय नहीं मिलता, जिसके कारण वे बिना भुगतान के काम करने को तैयार नहीं हैं।
हालांकि, साल्हेभाठा माध्यमिक शाला में एक अलग तस्वीर देखने को मिली। यहां के प्रधान पाठक संजय चंद्राकर ने बताया कि रसोइयों द्वारा काम करने से मना किए जाने के बाद विद्यालय प्रबंधन ने स्वयं पहल की। रसोइयों को आश्वस्त किया गया कि 15 दिनों का पारिश्रमिक शिक्षकों द्वारा अपने स्तर पर दिया जाएगा। इसके बाद रसोइयों ने मध्यान्ह भोजन बनाना शुरू किया और विद्यालय में भोजन व्यवस्था सुचारू रूप से संचालित हो रही है।
बच्चों के पोषण पर पड़ रहा असर
मध्यान्ह भोजन योजना ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों के लिए पोषण का महत्वपूर्ण माध्यम है। ऐसे में सत्र प्रारंभ होने के बाद भी कई विद्यालयों में भोजन व्यवस्था शुरू नहीं होना चिंता का विषय बन गया है। अब अभिभावकों और शिक्षकों की नजर शासन और शिक्षा विभाग पर है कि रसोइयों की मांगों का समाधान कब तक होता है और प्रदेश के सभी स्कूलों में मध्यान्ह भोजन व्यवस्था कब तक सामान्य हो पाती है।


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