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सुर्खियों में ‘अनाम’ आरोपी: महासमुंद में आखिर कौन हैं वो दो भाजपा नेता, जिन पर अपनों से ही लाखों की ठगी के आरोप?

महासमुंद। नौकरी दिलाने के नाम पर लाखों रुपये की कथित ठगी का मामला अब सियासी गलियारों से निकलकर शहर के चौक-चौराहों तक चर्चा का विषय बन गया है। कांग्रेस नेता अंकित बागबाहरा द्वारा इस मामले को सार्वजनिक किए जाने के बाद आम जनता और भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच एक सवाल तेजी से उठ रहा है—आखिर महासमुंद के वे ‘बड़े नेता और नेत्री’ कौन हैं, जिन पर अपनी ही पार्टी से जुड़े पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं से रेलवे, राजस्व और समग्र शिक्षा विभाग में नौकरी दिलाने के नाम पर रकम लेने के गंभीर आरोप लगाए गए हैं?

हालांकि, सार्वजनिक रूप से सामने आई चर्चाओं और खबरों में कथित आरोपियों के नाम स्पष्ट रूप से सामने नहीं आए हैं। इससे मामले को लेकर तरह-तरह के सवाल उठने लगे हैं। हालांकि, आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और पुलिस अथवा न्यायिक स्तर पर अंतिम निष्कर्ष सामने आना अभी बाकी है।

‘अपनों’ को भी नहीं बख्शा, संगठन के भीतर बढ़ रही नाराजगी

मामले का सबसे गंभीर पहलू यह बताया जा रहा है कि जिन लोगों से कथित तौर पर लाखों रुपये लिए गए, उनमें कई लोग भाजपा संगठन से जुड़े बताए जा रहे हैं। पीड़ितों के रूप में ओंकार सिन्हा, डिगेश, भारतेंद्र, ममता, रेणुका, तोषण, देवेंद्र, अतुल और शबनम के नाम सामने आए हैं। आरोप है कि इनसे करीब एक से डेढ़ लाख रुपये तक नौकरी दिलाने के नाम पर लिए गए।

बताया जा रहा है कि लंबे समय तक अपनी शिकायत लेकर भटकने के बाद पीड़ितों ने पार्टी के प्रदेश नेतृत्व और गृहमंत्री तक भी शिकायत पहुंचाई। यदि ये आरोप सही पाए जाते हैं तो मामला केवल आर्थिक ठगी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इससे संगठन के भीतर विश्वास और जवाबदेही को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े होंगे।

नाम सार्वजनिक क्यों नहीं? उठ रहे तीन बड़े सवाल

1. आखिर संरक्षण किसका?
यदि शिकायतों में कथित आरोपियों के नाम दर्ज हैं, तो फिर सार्वजनिक चर्चा में उन्हें केवल ‘बड़ा नेता और नेत्री’ कहकर क्यों संबोधित किया जा रहा है? क्या किसी प्रभावशाली व्यक्ति का नाम सामने आने से राजनीतिक विवाद बढ़ने की आशंका है?

2. शिकायतें हो चुकीं, फिर कार्रवाई कहां है?
बताया गया है कि 16 जून को प्रदेश अध्यक्ष, 1 जुलाई को गृहमंत्री को लिखित शिकायत और 14 जुलाई को शपथपत्र प्रस्तुत किया गया। इसके बावजूद यदि अब तक मामले में स्पष्ट कार्रवाई नहीं हुई है, तो शिकायतों की जांच किस स्तर पर पहुंची है, यह भी बड़ा सवाल है।

3. 10 महीने बाद भी इंतजार क्यों?
पीड़ितों का दावा है कि वे करीब 10 महीने से अपनी रकम वापस पाने और कार्रवाई की मांग को लेकर संबंधित लोगों के चक्कर काट रहे हैं। यदि आरोप सही हैं तो अब तक रकम की वापसी और कानूनी कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं हुई?

जनता पूछ रही है सवाल

महासमुंद में इस पूरे मामले को लेकर अब पारदर्शिता की मांग उठ रही है। पीड़ितों का कहना है कि यदि उनके आरोप सही हैं तो निष्पक्ष जांच कर जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। वहीं, आरोपों की सत्यता सामने लाने के लिए पुलिस और संबंधित जांच एजेंसियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है।

सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कथित तौर पर रकम किसने ली, बल्कि यह भी है कि नौकरी के नाम पर पैसा लेने के आरोपों की जांच कब पूरी होगी और दोषी पाए जाने वालों पर कार्रवाई कब होगी?

फिलहाल महासमुंद में ‘बड़े नेता और नेत्री’ की पहचान को लेकर चर्चाएं तेज हैं। लेकिन जब तक आधिकारिक जांच या संबंधित एजेंसी की ओर से नाम और आरोपों की पुष्टि नहीं होती, तब तक किसी व्यक्ति को आरोपी या दोषी ठहराना उचित नहीं होगा।

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