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ममता की मिसाल : जंगल से गांव पहुंची मां की ममता, भालुओं के अद्भुत प्रेम का साक्षी बना बाम्हनडीह गांव!

महासमुंद। बागबाहरा के घने जंगलों में वन्यजीवों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इन दिनों जंगली सुअर जहां किसानों की फसलों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। तेंदुए गांव के पालतू पशुओं पर हमला कर रहे हैं। लेकिन इस बार कहानी कुछ अलग है, यह जंगल के एक नन्हे मेहमान की है। जो अपनी मां से बिछड़कर गांव में रुक गया और फिर एक अद्भुत नजारा सामने आया, जिसने साबित कर दिया कि ममता केवल इंसानों की ही नहीं होती, बल्कि जानवरों की दुनिया में भी उतनी ही गहरी होती है।

गुरुवार की सुबह बाम्हनडीह गांव में हलचल मची, जब कुत्तों के भौंकने की आवाज़ सुनकर कौशलेस तिवारी नामक ग्रामीण खंडहर की ओर बढ़े। उन्होंने वहां एक नन्हे से शावक को देखा, जो सहमा हुआ था। पहले तो उसे लगा कि वह किसी कुत्ते का बच्चा होगा। दया के भाव से उन्होंने उसे उठा लिया। घर ले जाकर उसे दूध पिलाने की कोशिश की। लेकिन जैसे ही गांव के बुजुर्गों ने उसे ध्यान से देखा, वे चौंक गए। बुजुर्गों ने कहा यह कोई साधारण जानवर नहीं, बल्कि भालू का बच्चा है। ग्रामीणों की सलाह पर कौशलेस तिवारी ने शावक को उसी खंडहर में वापस छोड़ दिया और वन विभाग को इसकी सूचना दी। वन विभाग के अधिकारियों ने कुछ समय इंतजार करने की सलाह दी, ताकि शावक की मां उसे वापस ले जा सके। ग्रामीणों की नजर दिनभर उस खंडहर पर टिकी रही।

शाम होते ही गांव में एक अप्रत्याशित घटना घटी। झाड़ियों के पीछे हलचल बढ़ी और फिर ग्रामीणों ने देखा कि एक नहीं, दो नहीं, बल्कि पूरा भालुओं का झुंड गांव की ओर बढ़ रहा है। पहले कभी इतनी बड़ी संख्या में भालू नहीं देखे गए थे। लोग सांस रोके इस दृश्य को देख रहे थे। डर भी था लेकिन उससे कहीं ज्यादा विस्मय। भालुओं के बीच से एक मादा भालू आगे आई, उसकी चाल में एक बेचैनी थी। वह उस खंडहर की ओर बढ़ी, जहां सुबह का भूला-भटका नन्हा शावक रखा गया था। फिर जैसे ही उसकी नज़र अपने बच्चे पर पड़ी, उसने बिना देर किए उसे अपने मुंह में उठा लिया। यह एक ऐसा दृश्य था, जिसने हर किसी की आंखों में ममता की गहराई को उकेर दिया।

पाटमेश्वरी देवी मंदिर बना ठिकाना

भालूओं ने जल्दबाज़ी नहीं की। उन्होंने अपनी सुरक्षा के लिए अंधेरा होने तक इंतजार किया। किसी भी खतरे से बचने के लिए उन्होंने समूह में आकर अपने बच्चे को सुरक्षित वापस ले जाने की योजना बनाई। ऐसा लगा जैसे जंगल से पूरे कुनबे ने इस नन्हे शावक को बचाने की कसम खा ली हो। और फिर, मां भालू बच्चे को अपनी पीठ पर बिठाकर धीरे-धीरे पाटमेश्वरी देवी मंदिर की ओर बढ़ गई। उसके पीछे-पीछे पूरा भालुओं का समूह चला गया, जैसे किसी विजय यात्रा पर निकला हो।

गांव के बुजुर्गों का मानना है कि भालुओं का यह समूह अब मंदिर परिसर में अपना ठिकाना बना चुका है। संभवतः मादा भालू ने वहीं बच्चे को जन्म दिया था और रोज़ उसे लेकर गांव की ओर आती रही। वन्यजीव के जानकारों का कहना है कि शावक की उम्र महज़ 10 से 12 दिन की होगी।