अतीत की आग नहीं भविष्य की रोशनी बनिए

ज़िंदगीनामा

डॉ. नीरज गजेंद्र : जीवन की राह किसी सीधी रेखा की तरह नहीं होती। यह उतार-चढ़ाव, मोड़, भ्रम और अनेक मोर्चों से होकर गुजरती है। इस यात्रा में हम कई बार क्रोधित होते हैं, गलती करते हैं और भविष्य को लेकर चिंतित रहते हैं। लेकिन इन तीन भावनाओं क्रोध, पछतावा और चिंता का यदि विश्लेषण करें, तो पाएंगे कि ये सब हमें वर्तमान से काट देती हैं। हम अतीत में खोए रहते हैं। भविष्य से डरे रहते हैं। लेकिन जीना तो आज में होता है। और आज का उठाया गया एक सही कदम, कल के पूरे जीवन की दिशा बदल सकता है।

क्रोध एक ऐसी आग है जो सबसे पहले हमें ही जलाती है। यह अक्सर तब आता है जब चीजें हमारी अपेक्षा के अनुसार नहीं होतीं। चाहे वह किसी रिश्ते में हो, काम में हो या समाज में। क्रोध से निकलने वाले निर्णय प्रायः क्षणिक संतोष तो देते हैं, और दीर्घकालिक नुकसान छोड़ जाते हैं। यह क्षणिक आवेश हमारी भाषा, व्यवहार और संबंधों में ऐसी दरारें पैदा कर सकता है जिसे बाद में भरना मुश्किल हो जाता है।

इसी तरह पछतावा भी अतीत के किसी निर्णय, किसी शब्द या किसी चूक को लेकर होता है। हम बार-बार सोचते हैं, काश ऐसा न किया होता। लेकिन जीवन में काश और अगर से कुछ नहीं बदलता। अतीत को बार-बार उलटने से हम केवल वर्तमान का दम घोंटते हैं। पछतावा तभी सार्थक होता है जब वह आत्मनिरीक्षण में बदले और हमें बेहतर निर्णय लेने की प्रेरणा दे। वरना यह एक ऐसी बेड़ियों की तरह है जो हमें वर्तमान के उपयोगी कदम उठाने से रोक देती है।

और इसी तरह चिंता भी भविष्य का वह डर है, जो कभी घटा ही नहीं है। उसकी कल्पना ही हमारे वर्तमान को अवसाद से भर देती है। मन एक ऐसे कोने में चला जाता है जहां संभावनाएं नहीं, केवल आशंकाएं जन्म लेती हैं। ऐसे में व्यक्ति निष्क्रिय हो जाता है, अनिर्णय की स्थिति में फंस जाता है और अवसर हाथ से निकल जाते हैं। इन तीनों भावनाओं का समाधान केवल एक ही है। आगे का कदम। आपने गलत किया। मान लीजिए। आपने किसी को ठेस पहुंचाई। सुधार कीजिए। आप अनिश्चित हैं, फिर भी सोच-समझकर कदम उठाइए। क्योंकि अगला कदम ही वह बिंदु है, जहां अतीत की भूलें सुधर सकती हैं। भविष्य का मार्ग बदल सकता है।

विचार कीजिए कि जब भी आप साइकिल चलाना सीखते हैं। गिरते हैं, संभलते हैं और तब जाकर संतुलन आता है। जीवन भी कुछ वैसा ही है। पर गिरने के बाद अगर हम केवल गिरने को लेकर पछताते रहें या आगे गिरने की चिंता में कदम ही न बढ़ाएं, तो संतुलन कभी नहीं आएगा। समस्या यह नहीं कि हम गलतियां करते हैं। समस्या तब होती है जब हम उन्हीं गलतियों के बोझ तले दबकर बैठ जाते हैं और आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। महात्मा बुद्ध ने कहा था, क्रोध को क्रोध से नहीं, केवल करुणा से जीता जा सकता है। उसी तरह पछतावे को सुधार से, और चिंता को कर्म से जीता जा सकता है।

दृढ़ निश्चय से कैसे बदलती है असंभव की परिभाषा, बता रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार डॉ नीरज गजेंद्र, पढ़िए यहां

ये भी पढ़ें...

web morcha

यहां पढ़िए, स्वामी विवेकानंद के संदेशों से प्रेरित डॉ. नीरज गजेंद्र का प्रेरणास्पद विश्लेषण बाज की उड़ान और युवा चेतना का वैचारिक जीवन सूत्र

ChhattisgarhDr. Neeraj GajendraJournalist Dr. Neeraj GajendraSenior journalist Dr. Neeraj GajendraZindaginama: Dr. Neeraj Gajendra
[wpr-template id="218"]