फूलों की सुगंध और मनुष्य की अच्छाई किस-किस दिशा में कैसे फैलती है, बता रहे डॉ. नीरज गजेंद्र

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सूरज की पहली किरण जब कमल के फूल को छूती है, तो वह एक मधुर सी सुगंध बिखेर देती है। वह सुगंध केवल उसी दिशा में जाती है, जिधर हवा उसे ले जाती है। फूल की इस खुशबू की एक सीमा है। वह कुछ दूर तक ही जा पाती है, लेकिन क्या हर सुगंध की सीमा तय होती है। बिलकुल नहीं, हम बात कर रहे हैं उस अच्छाई के सुगंध की, जिसकी कोई दिशा या सीमा नहीं होती। वह उत्तर-दक्षिण, पूरब-पश्चिम, हर दिशा में बहती है। वह भी बिना हवा का सहारा लिए। आचार्य चाणक्य की यह बात पहली बार सुनने में बस एक सुंदर उपमा लगती है कि फूलों की सुगंध हवा की दिशा में और मनुष्य की अच्छाई हर दिशा में फैलती है। वह स्वप्रेरित होती है। वह जहां भी जाती है, वहां अपनी छाप छोड़ आती है।

कभी-कभी कुछ बातें पहली बार सुनने में सुंदर लगती हैं, पर जब हम ठहरकर सोचते हैं, तो वह जीवन के सार की तरह प्रकट होती हैं। अच्छाई की भाषा न किसी ग्रंथ की मोहताज है, न किसी मंच की। शास्त्रों में कहा गया है कि सत्कर्म ही आत्मा की भाषा है। जब कर्म सच्चा होता है, तब वही धर्म बन जाता है। न कोई श्लोक चाहिए, न कोई दिखावा। अच्छाई सदा मौन चलती है, मगर उसकी यात्रा दूर तक होती है।

आज के समय में जब हम हर बात को तर्क, लाभ और प्रसिद्धि की कसौटी पर परखते हैं, तब अच्छाई अक्सर कमजोर दिखाई देती है। आप गौर कीजिए अच्छाई हमेशा चुपचाप चलती है, और दूर तक जाती है। एक बार एक युवक ने अपने गुरु से प्रश्न किया, कहा हे गुरुदेव, मैं बहुत छोटा हूं। मेरा कोई प्रभाव नहीं है फिर मेरी अच्छाई से क्या बदलेगा। गुरु मुस्कराते हुए कहते हैं कि कभी अंधेरे कमरे में दीया जलाया है। हां, कई बार। तो क्या हुआ। अंधेरा हट गया। बस, तू भी दीया ही है। जब तू अपने भीतर की ज्ञान रोशनी को जागृत करेगा तो भ्रम रूपी यह अंधकार दूर हो जाएगा और तूझे यह पता चलेगा कि तेरा प्रभाव क्या है, तेरी अच्छाई क्या है।

अच्छाई को दिशा नहीं चाहिए, उसे इरादा चाहिए। जब मनुष्य भीतर से निर्मल होता है, वह जहां जाता है, वहां अच्छाई का अंश छोड़ आता है। जैसे ऋषि वशिष्ठ का चरित्र राम को दिशा देता है। महात्मा बुद्ध की मौन मुस्कान भी लोगों के विक्षिप्त मन को शांत कर देती थी। वैसे ही हर वह व्यक्ति जो सच्चे मन से दूसरों के लिए सोचता है, वह अच्छाई का वाहक बन जाता है। आधुनिकता आज हमें विकल्प देती है, हम चुन सकते हैं। हम डिजिटल दुनिया में केवल दिखावा बनें या एक सच्चे प्रभाव का कारण बनें। हम सोशल मीडिया पर दूसरों को नीचा दिखाएं या छोटे-छोटे सकारात्मक कार्यों को साझा करके अच्छाई की सुगंध को बढ़ाएं। यह आधुनिक समय की तपस्या है भीड़ में अच्छाई को जीवित रखना।

यह समझना जरूरी है कि अच्छाई कोई प्रदर्शन नहीं, यह हमारी आत्मा की सुगंध है। फूल की तरह इसे किसी हवा की दिशा की जरूरत नहीं, यह तो अंतःकरण से निकलकर सब दिशाओं में जाती है। चाहे लोग उसकी सराहना करें या न करें। यही जीवन का सत्य मार्ग है, धर्म का भी, आत्मा का भी और युगों को सुगंधित करने वाली अच्छाई का भी।

(लेखक, वरिष्ठ पत्रकार हैं। जो लेखन के माध्यम से सामाजिक चेतना और बदलाव को शब्द देते हैं।)

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