
भेड़ियों के एक झुंड पर जब शेर ने अचानक हमला किया, तो पूरा झुंड भय से कांप उठा। जीवन और मृत्यु के उस निर्णायक क्षण में मंगल नाम का एक भेड़िया साहस के साथ आगे आया। उसने अपने साथियों से कहा कि तुम सब भाग जाओ, शेर से मैं मुकाबला करूंगा। मंगल की इस निर्भीकता ने झुंड को बचा लिया, किंतु स्वयं वह घायल होकर जंगल से दूर भाग गया। भागते-भागते वह एक रंगरेज के घर जा गिरा, जहां उसके शरीर पर नीला रंग पड़ गया। इस आकस्मिक घटना ने उसकी पहचान ही बदल दी। कई दिनों तक मंगल के न लौटने पर झुंड ने मान लिया कि वह मारा गया। कुछ समय बाद जंगल में एक अजीब नीला जानवर जो अपने रंग और आत्मविश्वास से रहस्यमय शक्ति का संकेत दे रहे था, को देख शेर सहित सभी जानवर डर गए। अज्ञान और भय के इसी वातावरण में उस नीले प्राणी को जंगल का राजा घोषित कर दिया गया। यह वही मंगल था, जिसने परिस्थितियों के कारण सत्ता का शिखर प्राप्त कर लिया था।
राजा बनने के बाद मंगल के भीतर पुरानी स्मृतियां जाग उठीं। उसे अपने झुंड की याद आई, अपने साथियों का अपनापन याद आया। भावनाओं के आवेग में उसने कुछ भेड़ियों को अपनी असली पहचान बता दी। यह रहस्य धीरे-धीरे शेर तक पहुंच गया। सत्य की परीक्षा के लिए शेर ने भेड़ियों को मंगल की गुफा के सामने भेजा। वे भेड़ियों की आवाज निकालने लगे। भावुक होकर मंगल भी वही आवाज निकाल बैठा। उसी क्षण शेर समझ गया कि नीला राजा कोई और नहीं, बल्कि वही पुराना भेड़िया मंगल है। क्रोध में उसी रात शेर ने मंगल का वध कर दिया। भेड़िए मंगल की कहानी मानव जीवन, समाज और सत्ता के व्यवहार को समझने का एक गहरा रूपक है। यह बताती है कि साहस, त्याग और नेतृत्व व्यक्ति को ऊंचाइयों तक ले जा सकता है, लेकिन असंयम, अति-भावुकता और समय से पहले विश्वास विनाश का कारण भी बन सकता है। मंगल ने अपने झुंड को बचाने के लिए शेर से मुकाबला किया। यह वही धर्म है जिसे भगवद्गीता में स्वधर्म कहा गया है। अपने कर्तव्य का निडर होकर पालन करना। श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि स्वधर्मे निधनं श्रेयः अपने धर्म में मरना भी श्रेष्ठ है। मंगल ने अपने प्राणों की परवाह किए बिना झुंड की रक्षा की, यही उसे असाधारण बनाता है।
मंगल की सबसे बड़ी भूल यह थी कि उसने अपना राज खोल दिया। मनुस्मृति कहती है कि न सर्वं कस्मैचिद् ब्रूयात् अर्थात हर समय, हर व्यक्ति और हर परिस्थिति में सत्य कहना भी विवेकहीनता हो सकता है। मंगल ने जिन भेड़ियों को अपना समझा, वे उसके पुराने संबंध थे, लेकिन नए पद पर पहुंचने के बाद वही संबंध उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन गए। कहावत है कि आपके अपने तब तक अपने हैं, जब तक आप उनके बराबर हैं। जैसे ही कोई व्यक्ति आगे बढ़ता है, समाज का एक वर्ग उसे स्वीकार नहीं कर पाता। ईर्ष्या, भय और असुरक्षा जन्म लेती है। मंगल ने अपने साथियों पर भरोसा किया, लेकिन यह भूल गया कि राजा बनने के बाद वह केवल भेड़िया नहीं रहा। नेतृत्व का धर्म अलग होता है। संदेश स्पष्ट है कि ऊंचाई पर पहुंचने के बाद पहचान, रहस्य और भावनाओं पर नियंत्रण आवश्यक है। हर मुस्कान मित्रता नहीं होती, और हर पुराना संबंध भरोसे के योग्य नहीं रहता। आत्मसंयम, विवेक और मौन ही सच्ची सुरक्षा है।
वरिष्ठ पत्रकार डॉ. नीरज गजेंद्र की दृष्टि वाली सीढ़ी, जो बुद्धू को भी बुद्धत्व तक पहुँचा देती है








