Become a member

Get the best offers and updates relating to Liberty Case News.

― Advertisement ―

spot_img

महासमुंद में राष्ट्रीय पांडुलिपि अभियान 2026 को मिली रफ्तार, 300 वर्ष पुराने दुर्लभ ग्रंथों की खोज

ज्ञान भरतम ऐप से हो रहा पंजीकरण, जनजातीय अंचलों में सुरक्षित मिलीं ऐतिहासिक धरोहरें

छत्तीसगढ़, महासमुंद। संस्कृति मंत्रालय के तहत संचालित राष्ट्रीय पांडुलिपि अभियान 2026 में महासमुंद जिले में दुर्लभ पांडुलिपियों के सर्वेक्षण और संरक्षण का कार्य तेज हो गया है। 16 मार्च 2026 से शुरू इस अभियान के अंतर्गत अब तक 300 वर्ष से अधिक पुराने हस्तलिखित ग्रंथों की पहचान की जा चुकी है। इनका पंजीकरण ज्ञान भरतम ऐप के माध्यम से किया जा रहा है।


महासमुंद जिले में राष्ट्रीय पांडुलिपि अभियान 2026 के तहत जनजातीय परिवारों के पास सुरक्षित 300 वर्ष पुरानी ताड़पत्र पांडुलिपियों का सर्वेक्षण करते अधिकारी और ग्रामीण
महासमुंद के जनजातीय अंचलों में दुर्लभ ताड़पत्र पांडुलिपियों का सर्वेक्षण करते अधिकारी, सैकड़ों वर्ष पुरानी ऐतिहासिक धरोहर सामने आई

जानें क्या है पांडुलिपि

पांडुलिपि वह हस्तलिखित दस्तावेज होती है, जो सामान्यतः 75 वर्ष से अधिक पुरानी होती है। ये ताड़पत्र, भोजपत्र, ताम्रपत्र, कपड़े या चमड़े जैसे पारंपरिक माध्यमों पर लिखी जाती हैं। इनमें धार्मिक ग्रंथ, इतिहास, लोकज्ञान, अनुष्ठान विधियां और औषधीय जानकारी संकलित रहती है।


महासमुंद: पांडुलिपियों का समृद्ध केंद्र

महासमुंद जिला ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से समृद्ध माना जाता है। वर्ष 2007 के सर्वेक्षण में इसे छत्तीसगढ़ का सबसे अधिक पांडुलिपि वाला जिला घोषित किया गया था। वर्तमान सर्वेक्षण में भी 100 से अधिक दुर्लभ पांडुलिपियां मिली हैं, जो हजारों पृष्ठों में फैली हुई हैं।


महासमुंद जिले में राष्ट्रीय पांडुलिपि अभियान 2026 के तहत जनजातीय परिवारों के पास सुरक्षित 300 वर्ष पुरानी ताड़पत्र पांडुलिपियों का सर्वेक्षण करते अधिकारी और ग्रामीण
महासमुंद के जनजातीय अंचलों में दुर्लभ ताड़पत्र पांडुलिपियों का सर्वेक्षण करते अधिकारी, सैकड़ों वर्ष पुरानी ऐतिहासिक धरोहर सामने आई

जनजातीय अंचलों में सुरक्षित धरोहर

कोमाखान क्षेत्र के जनजातीय समुदायों के पास ये पांडुलिपियां सुरक्षित पाई गई हैं। अधिकतर ग्रंथ ताड़पत्र पर उड़िया लिपि में लिखे गए हैं। इनमें भागवत पुराण, लक्ष्मी पुराण, दुर्गा ग्रंथ, भृगु संहिता, ज्योतिष, लोक चिकित्सा, पशु चिकित्सा और बाण विद्या जैसे विषय शामिल हैं।

शोध के लिए खुलेंगे नए आयाम

इन पांडुलिपियों से छत्तीसगढ़ और उड़ीसा की सीमावर्ती संस्कृति और इतिहास पर नए शोध की संभावनाएं बढ़ी हैं। वर्ष 2007 में डॉ. विजय शर्मा द्वारा खोजी गई 172 पांडुलिपियों का भी अब पुनः सत्यापन और डिजिटलीकरण किया जा रहा है।


संरक्षण की पारंपरिक विधि

जनजातीय परिवार इन पांडुलिपियों को देवता स्वरूप मानकर सुरक्षित रखते हैं। इन्हें कपड़े में लपेटकर घर की पाटी में रखा जाता है। रसोई के धुएं से कीट दूर रहते हैं, जिससे ये लंबे समय तक सुरक्षित रहती हैं। हालांकि उड़िया लिपि जानने वालों की संख्या घटने से अध्ययन में कठिनाई आ रही है।


विशेषज्ञों की मांग

विशेषज्ञों ने पांडुलिपियों के संरक्षण के लिए सरकार से मांग की है—

  • वैज्ञानिक तरीके से संरक्षण और सुरक्षित भंडारण
  • सभी पांडुलिपियों का डिजिटलीकरण
  • संरक्षक परिवारों का सम्मान
  • जागरूकता कार्यशालाएं
  • जनजातीय क्षेत्रों में शिक्षा को बढ़ावा

सर्वेक्षण टीम का दौरा

जिला नोडल अधिकारी रेखराज शर्मा और बीआरसीसी भूपेश्वरी साहू ने हाथीबहरा क्षेत्र का दौरा कर सर्वेक्षण कार्य का अवलोकन किया। इस दौरान डॉ. विजय शर्मा ने पांडुलिपियों के संरक्षकों—चमार राय नेताम, बलमत जगत और तुलाराम नेताम—से परिचय कराया और उनके संरक्षण के तरीकों की जानकारी दी।


अमूल्य धरोहर

राष्ट्रीय पांडुलिपि अभियान 2026 महासमुंद में सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण पहल बनकर सामने आया है। यह अभियान न केवल दुर्लभ ग्रंथों को सुरक्षित करेगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए ज्ञान की इस अमूल्य धरोहर को संजोने में भी अहम भूमिका निभाएगा।