18.37 लाख की स्वीकृति, 17.28 लाख का भुगतान… एक साल में तालाब का नामोनिशान नहीं। सरपंच-सचिव ने मानी निजी भूमि की बात, कार्यक्रम अधिकारी बोले- “शासकीय भूमि पर ही स्वीकृति मिलती है”, सीईओ ने कहा- “कब्जा मिला तो होगी कार्रवाई”
महासमुंद/बागबाहरा।महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के तहत हुए कार्यों की पारदर्शिता पर सवाल खड़ा करने वाला एक गंभीर मामला महासमुंद जिले के बागबाहरा विकासखंड से सामने आया है। ग्राम पंचायत सेलमर में वित्तीय वर्ष 2024-25 के दौरान ‘बिछवार नया तालाब’ निर्माण के लिए 18.37 लाख रुपये की प्रशासकीय स्वीकृति दी गई, जबकि ऑनलाइन रिकॉर्ड में 17 लाख 28 हजार 231 रुपये का भुगतान भी दर्शाया गया है। लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग है। जहां सरकारी रिकॉर्ड में तालाब दर्ज है, वहां आज अरबी (कोचई) की फसल लहलहा रही है।
वेबमोर्चा की टीम ने मौके पर पहुंचकर स्थल का निरीक्षण किया। सूचना पटल, ऑनलाइन रिकॉर्ड, राजस्व दस्तावेज, ग्रामीणों और संबंधित पक्षों से बातचीत के बाद कई ऐसे तथ्य सामने आए हैं, जो पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग कर रहे हैं।

सूचना पटल में तालाब, मौके पर खेत
मौके पर लगे मनरेगा सूचना पटल में स्पष्ट उल्लेख है कि यहां ‘बिछवार नया तालाब निर्माण’ कराया गया है। सूचना पटल में 18.37 लाख रुपये की प्रशासकीय स्वीकृति और कार्य का विवरण दर्ज है। वहीं मनरेगा के ऑनलाइन रिकॉर्ड में 17.28 लाख रुपये का भुगतान भी दिखाई देता है।
इसके विपरीत वर्तमान में वहां तालाब का कोई स्वरूप नजर नहीं आता। पूरा क्षेत्र समतल है और उसमें अरबी (कोचई) की खेती की जा रही है।
ग्रामीणों का आरोप- तालाब समतल कर कर लिया कब्जा
ग्रामीणों का आरोप है कि सरकारी राशि से तालाब बनने के बाद उसे समतल कर निजी कब्जा कर लिया गया। उनका कहना है कि अब उसी स्थान पर खेती की जा रही है, जबकि यह सार्वजनिक उपयोग के लिए निर्मित जल संरचना थी।
सरपंच का दावा- एक ही तालाब पर पहले भी कई बार खर्च हुई सरकारी राशि
ग्राम पंचायत के सरपंच ने दावा किया कि 18.37 लाख रुपये की हालिया स्वीकृति के अलावा पूर्व सरपंचों के कार्यकाल में भी इसी तालाब पर तीन बार सरकारी मद से लाखों रुपये खर्च किए गए थे।
यदि यह दावा सही है तो सवाल उठता है कि एक ही तालाब पर बार-बार सरकारी राशि खर्च होने के बावजूद आज उसका अस्तित्व क्यों नहीं है?
सचिव ने भी माना- जमीन निजी स्वामित्व की
मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि ग्राम पंचायत सचिव ने भी स्वीकार किया कि संबंधित भूमि निजी स्वामित्व की है।ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि भूमि निजी थी तो मनरेगा जैसी सार्वजनिक योजना के तहत वहां तालाब निर्माण की प्रशासनिक और तकनीकी स्वीकृति किस आधार पर दी गई?
जमीन मालिक के पति बोले- हमने खरीदी है जमीन
वेबमोर्चा ने भूमि स्वामी विद्याबाई के पति राधेश्याम से भी बातचीत की। उनका कहना है कि उन्होंने यह भूमि गांव के एक व्यक्ति से खरीदी है। यदि यह दावा सही है, तो यह जांच का विषय है कि निजी खरीद-बिक्री वाली भूमि पर सरकारी धन से सार्वजनिक तालाब का निर्माण कैसे स्वीकृत हुआ।
भुइयां रिकॉर्ड में बैंक में बंधक है भूमि
राजस्व विभाग के भुइयां पोर्टल के अनुसार संबंधित भूमि विद्याबाई के नाम दर्ज है और बैंक ऑफ बड़ौदा में बंधक (Mortgage) है। पोर्टल में यह भी दर्ज है कि ऋण अभी समाप्त नहीं हुआ है। यह तथ्य मामले की गंभीरता को और बढ़ा देता है तथा राजस्व अभिलेखों की जांच की आवश्यकता को मजबूत करता है।
गांव से दो किलोमीटर दूर, वनांचल में स्थित है स्थल
ग्रामीणों के अनुसार यह स्थल गांव से करीब दो किलोमीटर दूर वनांचल क्षेत्र में स्थित है। वहां पहुंचने के लिए नाला पार करना पड़ता है। ग्रामीणों का कहना है कि दूरस्थ स्थान होने के कारण लंबे समय तक किसी ने वास्तविक स्थिति पर ध्यान नहीं दिया।
अधिकारियों ने क्या कहा?
कार्यक्रम अधिकारी (मनरेगा) खुबचंद वर्मा
जनपद पंचायत के कार्यक्रम अधिकारी (मनरेगा) खुबचंद वर्मा ने कहा,
“ऐसा नहीं हो सकता। कार्य स्वीकृति से पहले पूरी तरह जांच होती है और शासकीय भूमि पर ही सरकारी तालाब का निर्माण कराया जाता है। यदि ऐसा मामला है तो मैं फाइल देखकर ही स्पष्ट बता पाऊंगा।”
जनपद पंचायत सीईओ एम.एल. मंडावी
जनपद पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (सीईओ) एम.एल. मंडावी ने कहा,
“सरकारी तालाब पर कोई किसान कब्जा नहीं कर सकता। यदि जांच में ऐसा पाया जाता है तो संबंधित किसान के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।”
अब जांच के घेरे में पूरा सिस्टम
प्रथम दृष्टया सामने आए तथ्यों के आधार पर निम्न बिंदुओं की जांच आवश्यक प्रतीत होती है—
- भूमि का वास्तविक स्वामित्व क्या है?
- तालाब निर्माण की स्वीकृति किस आधार पर दी गई?
- तकनीकी स्वीकृति और माप पुस्तिका (एमबी) किसने प्रमाणित की?
- 17.28 लाख रुपये का भुगतान किन कार्यों के आधार पर किया गया?
- यदि तालाब बना था तो उसका अस्तित्व समाप्त कैसे हुआ?
- सामाजिक अंकेक्षण (Social Audit) में यह मामला क्यों नहीं सामने आया?
- यदि यह सार्वजनिक तालाब था तो निजी खेती कैसे शुरू हुई?
जांच किनकी भूमिका की हो?
- निर्माण एजेंसी (ग्राम पंचायत)
- तत्कालीन एवं वर्तमान सरपंच (जहां आवश्यक हो)
- ग्राम पंचायत सचिव
- रोजगार सहायक
- तकनीकी सहायक
- कार्यक्रम अधिकारी (मनरेगा)
- संबंधित उपयंत्री एवं इंजीनियर
- सामाजिक अंकेक्षण इकाई
- राजस्व विभाग के संबंधित अधिकारी
अब निगाहें प्रशासन पर
यह मामला केवल एक तालाब तक सीमित नहीं है, बल्कि मनरेगा में सार्वजनिक धन के उपयोग, प्रशासनिक जवाबदेही और सरकारी संपत्तियों के संरक्षण से जुड़ा है। सूचना पटल, ऑनलाइन भुगतान रिकॉर्ड, राजस्व अभिलेख, स्थल की वर्तमान स्थिति और संबंधित पक्षों के बयानों में यदि विरोधाभास है, तो जिला प्रशासन के लिए आवश्यक होगा कि वह समयबद्ध, निष्पक्ष और बहु-विभागीय जांच कराकर वास्तविक स्थिति स्पष्ट करे और यदि किसी स्तर पर अनियमितता पाई जाती है तो जिम्मेदार व्यक्तियों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई सुनिश्चित करे।
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