
डॉ. नीरज गजेंद्र
समुद्र मंथन की कथा में एक बड़ा रोचक संकेत छिपा है। देव और दानव दोनों ने मिलकर मंथन किया, पर अमृत उसी को मिला जो तैयार था। सचेत था, और जिसने समय को पहचानकर अवसर को साध लिया। स्वयं भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप में परिस्थिति को दिशा दी, पर दिशा तब ही सार्थक हुई जब देवता प्रयासरत और जागरूक थे। यह कथा बताती है कि जीवन में भाग्य का उदय तभी होता है जब मनुष्य की चेतना जागी हो और कर्म उसके साथ चल रहे हों। अर्नेस्ट हेमिंग्वे का वाक्य है कि सचेत रहना भाग्यशाली होने से बेहतर है, ताकि आप सौभाग्य के लिए हमेशा तैयार रहें। वास्तव में समुद्र मंथन की इसी शिक्षा को आधुनिक भाषा में दोहरा देता है। अवसर हर किसी के जीवन में आता है, पर उसे पहचान वही पाता है जिसने अपने भीतर सजगता और तैयारी को जीवित रखा है। ठीक उसी तरह जैसे नचिकेता ने यमराज के सामने खड़े होकर निर्भीकता से प्रश्न पूछे। मृत्यु के देवता भी बालक नचिकेता के संकल्प और सजगता से चकित थे। ज्ञान उनकी प्रतीक्षा में नहीं आया, नचिकेता स्वयं उसकी ओर बढ़े। यह बढ़ना ही पुरुषार्थ है, और पुरुषार्थ ही वह शक्ति है जो भाग्य की धारा का रुख मोड़ देती है।
भारतीय दर्शन में भाग्य को एक स्थिर चट्टान नहीं माना गया। एक प्रवाह, एक बदलती हुई ऊर्जा, जो मनुष्य के कर्म और उसकी दिशा से नया रूप लेती है। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन को यही समझाते हैं। युद्धभूमि में खड़े अर्जुन के लिए भाग्य कोई निश्चित परिणाम नहीं था। उलझन, भय और मोह ने अर्जुन की दृष्टि को ढक दिया था। तब श्रीकृष्ण ने उन्हें सजग बनाया। कर्म को स्वीकार करने की तैयारी दी। कहा, तुम्हारा धर्म कर्म है, पलायन नहीं। जब मनुष्य स्वयं को तैयार कर लेता है, तभी जीवन का अर्थ स्पष्ट होता है, और इसी स्पष्टता से भाग्य का निर्माण होता है। यह सजगता केवल युद्ध या तप में नहीं, साधारण जीवन में भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। वाल्मीकि की कथा इसका सशक्त प्रमाण है। रत्नाकर डाकू था, हिंसा और अज्ञान में डूबा हुआ। पर एक क्षण ऐसा आया जब नारद के प्रश्नों ने उसके भीतर सोई चेतना को जगा दिया। उस जागरण ने उसके जीवन को पलट दिया। वह कर्म और साधना के ऐसे मार्ग पर चला कि सदियों बाद भी हम उसे आदिकवि वाल्मीकि के नाम से जानते हैं। एक पल का जागरण, एक पल का सत्य से सामना और उसके बाद की सतत साधना ने उसका भाग्य पुनर्लिख दिया।
शास्त्र बार-बार बताते हैं कि ज्ञान, कर्म और भक्ति। ये तीनों विकास के तीन स्तंभ हैं। ज्ञान दिशा देता है, कर्म गति देता है और भक्ति मन को स्थिरता देती है। पर इन तीनों को सक्रिय करने वाली शक्ति है सजगता। गीता सजगता को जागरण कहती है, उपनिषद इसे विवेक कहते हैं और आधुनिक चिंतक इसे अवर्नेस कहते हैं। हेमिंग्वे की चेतावनी बिल्कुल इसी ओर संकेत करती है कि सिर्फ भाग्यशाली होने की आशा किसी को सफल नहीं बनाती। सफल वही होता है जो तैयार रहता है मन से, विचार से और कर्म से। आज के समय में भी यही सत्य लागू होता है। अवसरों की कमी कभी नहीं होती। कमी होती है उन्हें पहचानने और उन्हें पकड़कर दिशा देने वाली मानसिक तैयारी की। भाग्य तब ही खिलता है जब मन एकाग्र और सक्रिय होता है। एक किसान को देखिए बीज उसके पास होता है, पर यदि वह ऋतु का ज्ञान न रखे, भूमि को तैयार न करे और मौसम के संकेतों को न समझे तो वही बीज व्यर्थ हो जाता है। इसी प्रकार मनुष्य के भीतर भी बीज समान प्रतिभाएं होती हैं। उन्हें अंकुरित करने का दायित्व उसी के कर्म पर है।
धर्म कहता है कि मनुष्य कर्मयोगी बने, आध्यात्म कहता है कि मन जागृत रखो, पुराण कहते हैं कि अवसर को पहचानो, और आधुनिक साहित्य कहता है कि तैयारी ही सफलता का मूल है। इन सभी की धारा एक ही स्थान पर आकर मिलती है। भाग्य से बड़ा है सजग कर्म। भाग्य अपने आप नहीं बदलता, वह उस क्षण बदलता है जब मनुष्य स्वयं बदलने का साहस करता है। जीवन की हर स्थिति में, समुद्र मंथन से लेकर अर्जुन के संशय तक, नचिकेता की जिज्ञासा से लेकर वाल्मीकि के परिवर्तन तक, एक ही निष्कर्ष निकलता है कि जो जाग रहा है, वही पा रहा है। जो कर्म में उतरा है, वही आगे बढ़ रहा है। और जो तैयार है, उसी को सौभाग्य साथ देता है।
फूलों की सुगंध और मनुष्य की अच्छाई किस-किस दिशा में कैसे फैलती है, बता रहे डॉ. नीरज गजेंद्र







