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हमारे जीवन को संबल देते हैं पितर : डॉ नीरज गजेंद्र

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वरिष्ठ पत्रकार डॉ. नीरज गजेंद्र

बड़े बुजुर्ग दरख़्त की तरह होते हैं। उनकी छाया में पीढ़ियां अपना घोंसला बनाती हैं। बढ़ती हैं और फिर आगे की पीढ़ियों को सहारा देती हैं। यही परंपरा घर-घर में दिखाई देती है। लेकिन जब कोई बड़ा इस दुनिया से विदा ले लेता है तो उसका शरीर भले हमारे बीच न रहे, उसकी स्मृति, उसका संस्कार और उसका आशीर्वाद पीढ़ियों तक हमारे साथ चलता रहता है। पितृपक्ष इसी गहरे भाव का नाम है।

हिंदू परंपरा में श्राद्ध पक्ष को पितरों का समय कहा जाता है। मान्यता है कि इस अवधि में हमारे पूर्वज धरती पर आते हैं और अपने वंशजों से जुड़ते हैं। ऋग्वेद, मनुस्मृति और महाभारत जैसे ग्रंथों में पितृयज्ञ और श्राद्ध का उल्लेख मिलता है। ‘श्राद्ध’ शब्द का अर्थ है श्रद्धा से किया गया कार्य। इसका सीधा संदेश यह है कि पितरों का स्मरण किसी दिखावे या भय से नहीं, बल्कि गहरी श्रद्धा से होना चाहिए। कहा जाता है कि महर्षि अत्रि और अगस्त्य ने सबसे पहले पितृयज्ञ का स्वरूप समाज को बताया। आगे चलकर इसे परंपरा का रूप मिला। श्राद्ध में जल तर्पण, पिंडदान और ब्राह्मण भोज जैसी विधियाँ इस भाव से की जाती हैं कि हमारे पितरों को तृप्ति मिले और वे संतुष्ट होकर आशीर्वाद दें।

रामायण में भी श्राद्ध का उल्लेख है। जब भगवान राम, सीता और लक्ष्मण वनवास में थे, उस समय भी उन्होंने पितरों का स्मरण करते हुए श्राद्ध कर्म किया। वाल्मीकि रामायण में वर्णन है कि पितृपक्ष में श्राद्ध न करने से पितर असंतुष्ट होते हैं और घर-परिवार की उन्नति रुक जाती है। इसलिए स्वयं श्रीराम ने वनवास जैसी कठिन परिस्थिति में भी श्राद्ध विधि को निभाया। यह प्रसंग हमें बताता है कि परिस्थिति चाहे जैसी भी हो, पितरों का स्मरण और सम्मान जीवन का अनिवार्य हिस्सा है।

आज जब हम पितृपक्ष मनाते हैं, तो यह केवल धार्मिक अनुष्ठान भर नहीं होता। यह एक अवसर होता है अपनी जड़ों से जुड़ने का। जैसे कोई दरख़्त अपनी जड़ों से शक्ति लेकर हरियाली बनाए रखता है, वैसे ही हम अपने पूर्वजों की स्मृतियों और आशीर्वाद से जीवन की ऊर्जा पाते हैं।

पितृपक्ष का हर दिन पितरों से संवाद का अवसर है। यह संवाद शब्दों से नहीं, बल्कि श्रद्धा से होता है। जब कोई पुत्र या परिवारजन तर्पण करते हैं, तो यह जल की बूंदें केवल गंगा, यमुना या किसी तालाब को नहीं छूतीं, बल्कि पीढ़ियों की आत्माओं को भी छूती हैं। यह हमारे अहंकार को भी झुकाती हैं और हमें यह याद दिलाती हैं कि हम अकेले नहीं हैं, बल्कि कई पीढ़ियों की धरोहर को अपने भीतर लेकर चल रहे हैं।

मान्यता है कि पितरों की प्रसन्नता से परिवार में सुख-समृद्धि आती है। यही कारण है कि श्राद्ध पक्ष को ‘महालय’ भी कहा गया है, यानी महान अवसर। जब हम श्रद्धा से अपने पूर्वजों को याद करते हैं तो केवल उनकी आत्मा ही तृप्त नहीं होती, बल्कि हमारा मन भी हल्का और शुद्ध होता है। यह आत्मिक संवाद हमें आगे बढ़ने की ताक़त देता है।

आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में हम अक्सर अपने अतीत और पूर्वजों को भूल जाते हैं। लेकिन पितृपक्ष हमें याद दिलाता है कि हमारी हर उपलब्धि, हर सुविधा और हर संस्कार पीछे की पीढ़ियों की मेहनत और त्याग से जुड़े हुए हैं। चाहे वे खेत में हल चलाने वाले किसान रहे हों या शिक्षा की अलख जगाने वाले, उनके बिना हमारी पीढ़ी अधूरी है।

श्राद्ध केवल विधि-विधान का नाम नहीं है, बल्कि स्मृति और कृतज्ञता का पर्व है। जब हम अपने पितरों को याद करते हैं, तो यह भावना हमारे बच्चों तक भी पहुँचती है। वे भी सीखते हैं कि जीवन केवल आगे बढ़ने का नाम नहीं, बल्कि पीछे झुककर धन्यवाद देने का भी नाम है।

पितृपक्ष हमें यह सिखाता है कि पूर्वज केवल कहानियों का हिस्सा नहीं हैं, वे हमारे जीवन का आधार हैं। उनकी उपस्थिति हमारे भीतर है और उनकी उन्नति ही हमारी उन्नति है। श्राद्ध पक्ष का हर दिन हमें यह अवसर देता है कि हम मौन रहकर, जल अर्पित करके, पिंडदान करके और सबसे बढ़कर श्रद्धा से अपने पितरों को स्मरण करें।

जैसे दरख़्त की जड़ें अदृश्य होकर भी दरख़्त को संभाले रहती हैं, वैसे ही पितर हमारे जीवन को संबल देते हैं। इसीलिए पितृपक्ष केवल धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि जीवन की सबसे गहरी सीख है। कृतज्ञ रहो, स्मृति को संजोए रखो और आगे बढ़ते समय अपनी जड़ों को मत भूलो।