दिलीप शर्मा…वृंदावन यात्रा । आस्था मेरे लिए बहुत गहरी नहीं है, लेकिन भारत के ऐतिहासिक और धार्मिक स्थानों को देखना मुझे बेहद पसंद है। इसी उत्सुकता और अनुभव की तलाश मुझे मथुरा-वृंदावन ले गई—जहां सिर्फ मंदिर ही नहीं, बल्कि जिंदगी, भीड़, भक्ति और रोमांच का अनोखा संगम देखने को मिला।
मथुरा से वृंदावन: एक जिम्मेदारी के साथ यात्रा
दरअसल, एक महिला और एक युवती घर से बिना बताए वृंदावन आ गई थीं। उन्हें वापस लाने की जिम्मेदारी के चलते हम मथुरा पहुंचे। रेलवे स्टेशन से ऑटो लेकर वृंदावन पहुंचे तो शाम हो चुकी थी।
सीधे उनसे मुलाकात हुई। काफी समझाने के बाद वे वापस आने को तैयार हो गईं। रात को होटल में ठहरकर भोजन किया और आराम किया।
बांके बिहारी मंदिर: भीड़ में घुटता सांस, फिर भी अद्भुत अनुभव
अगली सुबह स्नान के बाद हम वृंदावन के प्रसिद्ध बांके बिहारी मंदिर पहुंचे।
मंदिर के बाहर से ही भारी भीड़ नजर आ रही थी। जैसे-जैसे अंदर बढ़े, स्थिति और कठिन होती गई। हजारों लोगों के बीच ऐसा लग रहा था कि सांस लेना भी मुश्किल हो गया है।
कई घंटों के इंतजार के बाद जब दर्शन हुए—तो सामने भव्य मंदिर और बिहारी जी की आकर्षक मूर्ति… पूरा माहौल जयकारों से गूंज रहा था। थकान के बावजूद वह क्षण यादगार बन गया।
अगला दिन: अकेले निकला और शुरू हुआ असली रोमांच
दूसरे दिन सुबह करीब 11 बजे मैं अकेले ही घूमने निकल पड़ा। कुछ दूर चलने पर देखा—सैकड़ों लोग “राधे-राधे” कहते हुए एक दिशा में जा रहे हैं।
मैंने एक दुकानदार से पूछा, तो उसने बताया—ये लोग वृंदावन की परिक्रमा कर रहे हैं। उसने कहा, “आप इस रास्ते पर चलिए, घूमकर वहीं पहुंच जाएंगे।”
मुझे यह सुनकर उत्सुकता हुई… और मैं भी चल पड़ा।
यमुना किनारा: भक्ति और प्रकृति का अद्भुत संगम
कुछ किलोमीटर चलने के बाद सामने बहती हुई यमुना नदी दिखी।
वहां हजारों लोग मौजूद थे, नाव चल रही थीं, घाटों पर भीड़ थी… दृश्य इतना खूबसूरत था कि थकान भूल गया।
मेरे लिए यह सिर्फ यात्रा नहीं, बल्कि एक अनुभव बन चुका था।
बंदर और चश्मा: यात्रा की सबसे अनोखी घटना 🐒
इसी दौरान एक अजीब घटना हुई। चलते-चलते एक व्यक्ति ने मुझे टोका—“भाई, चश्मा अंदर कर लो।”
मैं उसकी बात समझ नहीं पाया… और अगले ही पल एक बंदर आया और मेरा चश्मा छीनकर भाग गया!
मेरे लिए तो जैसे अंधेरा छा गया। तभी दो युवक आए और बोले—
“चश्मा वापस मिल जाएगा, लेकिन 2 माजा और 50 रुपए लगेंगे।”
मैंने तुरंत हां कर दी।
वृंदावन में हजारों बंदर हैं और वे खाने के बदले सामान लौटाते हैं। काफी कोशिश के बाद बंदर को माजा दिया गया और आखिरकार उसने मेरा चश्मा वापस कर दिया।
यह अनुभव जितना डरावना था, उतना ही अनोखा भी।
12 किलोमीटर की परिक्रमा और अनिरुद्धाचार्य दरबार
चलते-चलते कब 11-12 किलोमीटर का रास्ता तय हो गया, पता ही नहीं चला।
इस दौरान मुझे अनिरुद्धाचार्य जी के दरबार में जाने का अवसर मिला।
यहां हजारों लोग मौजूद थे, लाखों में दान-दक्षिणा हो रही थी और सैकड़ों लोग भंडारे का प्रसाद ग्रहण कर रहे थे।
यहां का माहौल पूरी तरह आध्यात्मिक ऊर्जा से भरा हुआ था।
यात्रा का अंत: थकान, संतोष और यादगार अनुभव
शाम करीब 5 बजे मेरी यह परिक्रमा पूरी हुई। मैं होटल लौटा, आराम किया और अगले दिन ट्रेन पकड़कर घर वापस आ गया।








