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भारत की कंपनियों का वैश्विक विस्तार, रिकॉर्ड एफपीआई निकासी और तेल कीमतों में उछाल

ब्रेकिंग न्यूज़: भारतीय अर्थव्यवस्था में उठापटक, विदेशी निवेशक वापस बुला रहे धन!
विदेशों में भारतीय कंपनियों का निवेश बढ़ा, कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती रहीं।

नई दिल्ली: भारतीय अर्थव्यवस्था में एक असामान्य स्थिति देखने को मिल रही है। जहां एक ओर विदेशी निवेशक वित्तीय बाजारों से धन निकाल रहे हैं, वहीं दूसरी ओर भारतीय कॉर्पोरेट क्षेत्र विदेशों में अपने निवेश को बढ़ा रहा है। ऐसे समय में जब कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं, यह परिवर्तन भारतीय आर्थिक माहौल पर गहरा प्रभाव डाल सकता है।

भारतीय कंपनियों के बाहर बढ़ते निवेश

हाल ही में विभिन्न रिपोर्टों में यह बताया गया कि मार्च में भारत द्वारा किए गए बाहर के प्रत्यक्ष निवेश (FDI) में 27.5% की वृद्धि हुई है। मार्च में यह आंकड़ा 7.06 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया। पिछले वर्ष मार्च में यह केवल 5.54 अरब अमेरिकी डॉलर था। यह स्पष्ट करता है कि भारतीय कंपनियां इस वर्ष पिछले वर्ष की तुलना में अधिक निवेश कर रही हैं।

अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यह वृद्धि भारतीय कंपनियों की अंतरराष्ट्रीय विस्तार योजनाओं को दर्शाती है। हालाँकि, यह स्थिति विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) के लिए चिंताजनक है, जो इस वर्ष अब तक 1.68 लाख करोड़ रुपये की रिकॉर्ड निकासी कर चुके हैं। विशेष रूप से, केवल मार्च में 1.1 लाख करोड़ रुपये की बिक्री हुई।

कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें

इस बीच, विश्व के कुछ हिस्सों में चल रहे संघर्षों के कारण कच्चे तेल की कीमतें भी चढ़ रही हैं। हाल ही में ब्रेंट क्रूड की कीमतें 90 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल के निकट पहुँच गई हैं। यह 22% की वृद्धि है, जो 28 फरवरी को संघर्षों की शुरुआत के बाद से हुई है। चाहे अमेरिका-इस्राइल और ईरान के बीच का टकराव हो, भारत में यह स्थिति महंगाई बढ़ाने के साथ-साथ fiscal deficit को भी प्रभावित कर सकती है।

इस दौरान, भारत का कच्चा तेल बास्केट भी महंगा हुआ है, जो अप्रैल की शुरुआत में 118 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल को पार कर गया। जब तक ये संघर्ष समाप्त नहीं होते, तब तक भारत में ईंधन की कीमतों में और बढ़ोतरी की संभावना बनी रहेगी।

वित्तीय वर्ष में उच्चतम FDI

2025-26 के वित्तीय वर्ष में, भारत का बाहर का FDI 48.6 अरब अमेरिकी डॉलर रहा, जबकि पिछले वित्तीय वर्ष में यह 43.7 अरब अमेरिकी डॉलर था। इसमें एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि ऋणों में गिरावट देखी गई, जो मार्च में 691.95 मिलियन अमेरिकी डॉलर पर आ गई, जबकि वार्षिक आधार पर ये 1.52 अरब अमेरिकी डॉलर थे।

हालांकि, गारंटियों में वृद्धि हुई है। मार्च में यह 4.91 अरब अमेरिकी डॉलर से बढ़कर 1.45 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक हो गई। टाटा मोटर्स, रिलायंस इंडस्ट्रीज और अन्य कंपनियों ने इस अवधि में बड़ी गारंटी commitments की है।

निष्कर्ष

जहां भारतीय कंपनियों का अंतरराष्ट्रीय निवेश बढ़ रहा है, वहीं विदेशी निवेशकों की वापसी और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें एक चुनौती पेश कर रहे हैं। इन सभी कारकों का मिलाजुला प्रभाव भारतीय अर्थव्यवस्था पर देखने को मिलेगा। आगे की गतिविधियों पर नज़र रखना आवश्यक है, ताकि हम इन परिवर्तनों का सही आकलन कर सकें।

(यह लेख 21 अप्रैल, 2026 को प्रकाशित हुआ था।)

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