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17 लाख के ‘गायब’ तालाब की जांच में पहुंचे अधिकारी, ग्रामीणों ने कहा- प्रस्ताव और स्थल निरीक्षण के बाद मिली थी स्वीकृति

महासमुंद/बागबाहरा। ग्राम पंचायत भलेसर में मनरेगा के तहत स्वीकृत करीब 17 लाख रुपए के ‘बिछवार नया तालाब निर्माण’ को लेकर उठे सवालों की जांच अब मौके तक पहुंच गई है। 21 अगस्त को जनपद पंचायत से गठित जांच दल ग्राम भलेसर पहुंचा, जहां बड़ी संख्या में ग्रामीणों की मौजूदगी में संबंधित पक्षों के बयान दर्ज किए गए। जांच टीम ने विवादित स्थल का निरीक्षण भी किया, जहां तालाब की जगह धान की फसल और कोचई (अरबी) की खेती होना पाया गया।

मामले में इससे पहले तालाब निर्माण के नाम पर सरकारी राशि के उपयोग, भूमि के स्वामित्व और मौके पर तालाब का स्वरूप नहीं दिखाई देने को लेकर सवाल उठे थे। शिकायत के बाद प्रशासन ने चार सदस्यीय जांच दल गठित कर संबंधित पंचायत प्रतिनिधियों और कर्मचारियों को साक्ष्य सहित उपस्थित होने के निर्देश दिए थे।

ग्रामीणों ने कहा- प्रक्रिया पूरी होने के बाद हुई थी स्वीकृति

जांच के दौरान पूर्व सरपंच, वर्तमान सरपंच, पंचायत से जुड़े कर्मचारी और संबंधित मेट सहित अन्य लोग मौजूद रहे। ग्रामीणों और पंचायत पक्ष की ओर से एक स्वर में दावा किया गया कि तालाब निर्माण के लिए ग्राम पंचायत में प्रस्ताव पारित किया गया था और राजस्व पटवारी के स्थल निरीक्षण के बाद ही कार्य की स्वीकृति मिली थी।

पंचायत पक्ष का कहना है कि उक्त स्थान पर तालाब निर्माण का कार्य एक बार नहीं बल्कि तीन बार किया जा चुका है। ग्रामीणों ने जांच टीम के सामने यह भी आरोप लगाया कि निर्माण के दौरान जमीन को लेकर किसी व्यक्ति ने आपत्ति दर्ज नहीं कराई। तालाब का निर्माण पूरा होने के बाद संबंधित भूमि को निजी बताते हुए वहां कब्जा कर लिया गया।

हालांकि, भूमि के वास्तविक स्वामित्व और तालाब निर्माण के समय राजस्व विभाग की ओर से किए गए स्थल सत्यापन की स्थिति अब जांच का अहम हिस्सा बन गई है।

मौके पर तालाब की जगह मिली फसल

जांच दल ने विवादित स्थल का मौके पर निरीक्षण किया। यहां वर्तमान में तालाब का स्वरूप दिखाई देने के बजाय धान और कोचई (अरबी) की फसल लगी हुई मिली। यही स्थिति इस पूरे मामले को और गंभीर बना रही है।

अब जांच अधिकारियों के सामने यह पता लगाना महत्वपूर्ण होगा कि मनरेगा रिकॉर्ड में जिस स्थान पर तालाब निर्माण और भुगतान दर्ज है, वहां वर्तमान में तालाब की संरचना क्यों दिखाई नहीं दे रही है और यदि निर्माण हुआ था तो उसका वर्तमान स्वरूप क्या है।

निजी जमीन का दावा भी जांच के केंद्र में

मामले में जमीन को लेकर भी विवाद सामने आया है। एक पक्ष की ओर से संबंधित भूमि को निजी बताया जा रहा है, जबकि पंचायत स्तर पर यह दावा किया जा रहा है कि तालाब निर्माण के लिए निर्धारित प्रक्रिया के तहत प्रस्ताव और स्थल निरीक्षण के बाद कार्य स्वीकृत हुआ था।

यदि भूमि वास्तव में निजी स्वामित्व की पाई जाती है तो जांच में यह भी स्पष्ट करना होगा कि मनरेगा जैसी सार्वजनिक योजना के तहत निजी भूमि पर कार्य की स्वीकृति किस आधार पर हुई और भूमि का सत्यापन किस अधिकारी या कर्मचारी ने किया था।

वहीं यदि भूमि सरकारी अथवा सार्वजनिक उपयोग की दर्ज थी और बाद में उस पर निजी कब्जा हुआ, तो कब्जे की अवधि, भूमि रिकॉर्ड और वर्तमान स्थिति भी जांच का विषय बनेगी।

राजस्व विभाग की भूमिका पर भी उठे सवाल

जांच के दौरान एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी सामने आया कि भूमि स्वामित्व और मौके की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने के लिए राजस्व विभाग की प्रत्यक्ष भागीदारी क्यों नहीं दिखाई दे रही है। ग्रामीणों और शिकायत से जुड़े पक्षों के अनुसार जमीन के स्वामित्व को लेकर विवाद होने के कारण राजस्व रिकॉर्ड, नक्शा, खसरा और स्थल निरीक्षण का मिलान बेहद जरूरी है।

ऐसे में यदि जांच टीम में राजस्व विभाग के अधिकारी भी शामिल होकर मौके का सीमांकन और दस्तावेजों का सत्यापन करें तो भूमि विवाद की तस्वीर काफी हद तक साफ हो सकती है।

अलग-अलग बयान दर्ज, अब दस्तावेजों की होगी पड़ताल

जांच टीम ने मौके पर मौजूद संबंधित लोगों के पृथक-पृथक बयान दर्ज किए। अब जांच में ग्राम पंचायत प्रस्ताव, मनरेगा स्वीकृति, तकनीकी स्वीकृति, माप पुस्तिका, भुगतान से संबंधित दस्तावेज, भूमि के राजस्व रिकॉर्ड और मौके की स्थिति का मिलान महत्वपूर्ण होगा।

साथ ही यह भी देखा जाएगा कि तालाब निर्माण के दौरान कितनी राशि खर्च हुई, कितने कार्य दिवस दर्ज किए गए और भुगतान किन आधारों पर किया गया।

अब जांच रिपोर्ट पर टिकी निगाहें

21 अगस्त को हुई जांच और मौके के निरीक्षण के बाद अब यह मामला अगले चरण में पहुंच गया है। फिलहाल जांच टीम के सामने दोनों पक्षों के अलग-अलग दावे हैं। पंचायत पक्ष का कहना है कि प्रस्ताव और पटवारी के स्थल निरीक्षण के बाद तालाब स्वीकृत हुआ था तथा निर्माण भी किया गया, जबकि मौके पर अब तालाब की जगह खेती होना और जमीन को निजी बताए जाने का दावा मामले को उलझा रहा है।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि 17 लाख रुपए की योजना से बना तालाब वर्तमान में कहां है? क्या तालाब निर्माण वास्तव में स्वीकृत स्थान पर हुआ था, क्या बाद में उस पर निजी कब्जा हुआ या फिर भूमि चयन और सत्यापन में ही कोई गड़बड़ी हुई—इन सवालों का जवाब जांच रिपोर्ट से ही सामने आएगा।

फिलहाल जांच टीम के निरीक्षण और बयानों के बाद मामले में आगे की कार्रवाई जांच रिपोर्ट और दस्तावेजों के सत्यापन पर निर्भर करेगी। राजस्व रिकॉर्ड और मौके की वास्तविक स्थिति का आधिकारिक मिलान होने पर ही विवाद की तस्वीर पूरी तरह साफ हो सकेगी।

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