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Chhattisgarh Diwali 2026: दशकों बाद गांवों में लौटी रौनक, मानव तस्करी के नेटवर्क पर पुलिस का प्रहार; इस बार अपनों के बीच मनेगी दीपावली

महासमुंद/रायपुर। कभी दशहरा खत्म होते ही गांवों की गलियां सूनी होने लगती थीं। खेत-खलिहानों में काम करने वाले गरीब परिवार अपने घरों में ताला लगाकर बच्चों और सामान के साथ दूसरे राज्यों के ईंट-भट्ठों की ओर निकल पड़ते थे। गांवों में बुजुर्ग, कुछ महिलाएं और बच्चे ही रह जाते थे। दीपावली आती थी, लेकिन जिन घरों में अपनों की मौजूदगी से रौनक होनी चाहिए थी, वहां अक्सर सन्नाटा पसरा रहता था।

लेकिन इस बार तस्वीर बदली हुई है। छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले और सीमावर्ती ओडिशा के गांवों में दशकों बाद दीपावली पर एक अलग ही माहौल दिखाई दे रहा है। गांवों में परिवार मौजूद हैं, घरों में दीये जल रहे हैं, आंगन में बच्चों की चहल-पहल है और अपनों के साथ त्योहार मनाने की खुशियां लौट रही हैं। मजदूरों के बड़े पैमाने पर होने वाले मौसमी पलायन पर इस बार काफी हद तक विराम लगता दिखाई दे रहा है।

इस बदलाव के पीछे मजदूरों के कथित शोषण, बंधुआ मजदूरी और मानव तस्करी के नेटवर्क के खिलाफ छत्तीसगढ़ और ओडिशा पुलिस की लगातार कार्रवाई को एक बड़ी वजह माना जा रहा है। सितंबर से अक्टूबर के बीच दोनों राज्यों की पुलिस ने अलग-अलग मामलों में कुल 10 आरोपियों को गिरफ्तार किया है। इनमें महासमुंद जिले के कई आरोपी भी शामिल हैं। इन गिरफ्तारियों के बाद मजदूरों को अग्रिम रकम देकर दूसरे राज्यों में भेजने वाले कथित नेटवर्क की गतिविधियों पर दबाव बढ़ा है।

₹1.48 करोड़ की नकदी से खुला नेटवर्क, महासमुंद पुलिस की बड़ी कार्रवाई

25 सितंबर 2026 को महासमुंद पुलिस ने मानव तस्करी, बंधुआ मजदूरी और बाल मजदूरी से जुड़े कथित संगठित नेटवर्क के खिलाफ बड़ी कार्रवाई की थी। पुलिस की प्रेस विज्ञप्ति के मुताबिक, महासमुंद और ओडिशा के नुआपाड़ा जिले में नेटवर्क से जुड़े 10 ठिकानों पर एक साथ छापेमारी की गई थी।

इस कार्रवाई में पांच आरोपियों को गिरफ्तार किया गया था। पुलिस ने आरोपियों के ठिकानों से 1 करोड़ 48 लाख 54 हजार 750 रुपये नकद जब्त किए थे। इसके अलावा मजदूरों के पलायन से संबंधित रजिस्टर, डायरी, मोबाइल फोन, बैंक पासबुक, चेकबुक, एटीएम कार्ड और संपत्ति से जुड़े दस्तावेज भी बरामद किए गए थे।

पुलिस के अनुसार, यह नेटवर्क एक नाबालिग लड़की के शारीरिक शोषण और गर्भवती होने के बाद अस्पताल से मिले मेमो की जांच के दौरान सामने आया था। जांच में गरीब परिवारों को अग्रिम रकम देकर कथित कर्ज-जाल में फंसाने और उन्हें उत्तर प्रदेश के ईंट-भट्ठों में काम करने के लिए भेजने की बात सामने आई थी।

पुलिस ने मुकेश चंद्राकर को कथित नेटवर्क का मुख्य सरगना बताते हुए उसके साथ लता सबर, जगत गुप्ता, नंद मोहंती और पीयूष अग्रवाल को गिरफ्तार किया था।

छत्तीसगढ़ के बाद ओडिशा पुलिस की कार्रवाई, महासमुंद के दो कारोबारी भी गिरफ्तार

महासमुंद पुलिस की कार्रवाई के बाद 17 अक्टूबर 2026 को ओडिशा के नुआपाड़ा जिले की पुलिस ने भी मजदूरों के कथित शोषण से जुड़े एक मामले में पांच आरोपियों को गिरफ्तार किया।

नुआपाड़ा पुलिस के मुताबिक, श्रमिक सरदार वर्ष 2021 से गरीब परिवारों को अग्रिम रकम देकर उत्तर प्रदेश के ईंट-भट्ठों में काम के लिए भेज रहे थे। शिकायत में मजदूरों को अमानवीय परिस्थितियों में रखने, उनकी आवाजाही रोकने, मारपीट करने और रकम लौटाने के नाम पर धमकी देने के आरोप लगाए गए थे।

इस मामले में ओडिशा के तीन आरोपियों के साथ महासमुंद जिले के तेंदुकोना निवासी संतोष अग्रवाल और बसना निवासी अनूप अग्रवाल को भी गिरफ्तार किया गया।

इस तरह दोनों राज्यों की पुलिस की अलग-अलग कार्रवाइयों में कुल 10 आरोपी गिरफ्तार हुए। हालांकि दोनों मामलों की जांच और न्यायिक प्रक्रिया अलग-अलग है, लेकिन इन कार्रवाइयों ने सीमावर्ती क्षेत्रों में मजदूरों के पलायन से जुड़े कथित नेटवर्क को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

पहले दशहरा के बाद शुरू होता था पलायन, इस बार गांवों में ही हैं परिवार

महासमुंद जिले के ग्रामीण अंचलों में हर साल दशहरा के बाद एक पुरानी तस्वीर दिखाई देती थी। मजदूर परिवारों को ईंट-भट्ठों में काम दिलाने के नाम पर अग्रिम रकम दी जाती थी। इसके बाद दलालों और श्रमिक सरदारों के माध्यम से बड़ी संख्या में परिवार उत्तर प्रदेश, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और अन्य राज्यों की ओर रवाना हो जाते थे।

इस पलायन का सबसे ज्यादा असर गांवों की सामाजिक जिंदगी पर पड़ता था। कई घरों में ताले लटक जाते थे। बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती थी। परिवारों को महीनों तक अपने गांव और रिश्तेदारों से दूर रहना पड़ता था। मजदूरी के बदले मिलने वाली रकम में अग्रिम भुगतान और कथित कर्ज की कटौती के कारण कई परिवारों की आर्थिक स्थिति भी नहीं सुधर पाती थी।

लेकिन इस दीपावली पर ग्रामीण क्षेत्रों से मिल रही तस्वीरें अलग हैं। पहले की तरह बड़े पैमाने पर परिवारों के गांव छोड़ने का सिलसिला दिखाई नहीं दे रहा है। कुछ सीमित संख्या में मजदूरों का पलायन जारी हो सकता है, लेकिन दशहरा के बाद हजारों की संख्या में परिवारों के निकलने वाली पुरानी स्थिति में इस बार बदलाव नजर आ रहा है।

गांवों में लौटी दीपावली की असली खुशी

दीपावली सिर्फ दीये और आतिशबाजी का त्योहार नहीं है। इसकी असली खुशी परिवार के साथ होने में है। जिन घरों में वर्षों से दीपावली पर बेटे-बेटियां, बहुएं और छोटे बच्चे दूसरे राज्यों में मजदूरी करने के कारण मौजूद नहीं रहते थे, वहां इस बार अपनों की मौजूदगी ने त्योहार को खास बना दिया है।

गांवों में बच्चों की आवाजें सुनाई दे रही हैं। परिवार घरों की सफाई और रंगाई-पुताई में जुटे हैं। बाजारों में खरीदारी हो रही है। खेतों में काम करने वाले किसान और मजदूर अपने परिवार के साथ त्योहार की तैयारी कर रहे हैं।

दशकों से पलायन की पीड़ा झेल रहे ग्रामीण समाज के लिए यह बदलाव किसी बड़ी राहत से कम नहीं है। गांवों की रौनक लौटना केवल एक मौसमी बदलाव नहीं, बल्कि ग्रामीण परिवारों की सामाजिक सुरक्षा और सम्मान से भी जुड़ा सवाल है।

पुलिस की कार्रवाई की हो रही सराहना, लेकिन चुनौती अभी बाकी

मानव तस्करी और बंधुआ मजदूरी जैसे मामलों में कार्रवाई करना आसान नहीं होता। इसके लिए पीड़ित परिवारों की पहचान, शिकायतों की जांच, दस्तावेजों का संकलन और दूसरे राज्यों के साथ समन्वय जरूरी होता है। ऐसे में महासमुंद और नुआपाड़ा पुलिस की कार्रवाइयों को ग्रामीण क्षेत्रों में राहत की उम्मीद के रूप में देखा जा रहा है।

हालांकि केवल गिरफ्तारियों से समस्या का स्थायी समाधान नहीं होगा। जरूरत है कि गांव स्तर पर मजदूरों का पंजीयन हो, पलायन करने वाले परिवारों का रिकॉर्ड रखा जाए, श्रमिकों को वैध रोजगार उपलब्ध कराया जाए और दूसरे राज्यों में काम पर जाने वाले मजदूरों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।

इसके साथ ही ईंट-भट्ठों में मजदूरों की वास्तविक मजदूरी, काम की परिस्थितियों, बच्चों की शिक्षा और परिवारों की आवाजाही पर भी निगरानी जरूरी है। जिन परिवारों के साथ कथित शोषण हुआ है, उनके पुनर्वास और कानूनी सहायता पर भी ध्यान देना होगा।

इस दीपावली गांवों को मिला सबसे बड़ा उपहार

इस बार महासमुंद और आसपास के ग्रामीण अंचलों में दीपावली का संदेश कुछ अलग है। जिन गांवों में हर साल दशहरा के बाद सन्नाटा छा जाता था, वहां इस बार परिवारों की मौजूदगी से रौनक दिखाई दे रही है।

पुलिस की कार्रवाई ने कथित मजदूर तस्करी नेटवर्क के खिलाफ एक सख्त संदेश जरूर दिया है। अब इस कार्रवाई को स्थायी बदलाव में बदलने की जिम्मेदारी प्रशासन, श्रम विभाग, पंचायतों और पुलिस की है।

क्योंकि किसी गांव की असली समृद्धि केवल पक्की सड़कों और मकानों से नहीं मापी जाती। उसकी असली पहचान तब होती है, जब गांव के लोग अपने ही घरों में सुरक्षित रहें, बच्चों की पढ़ाई जारी रहे और त्योहार पर परिवार को एक साथ रहने के लिए किसी दूसरे राज्य से लौटने का इंतजार न करना पड़े।

इस दीपावली गांवों में जले दीये तो उनकी रोशनी में एक उम्मीद भी दिखाई दी—अब मजदूरी के नाम पर मजबूरी का पलायन नहीं, बल्कि गांव में रहकर सम्मान के साथ जिंदगी जीने का रास्ता मजबूत हो। दशकों बाद गांवों में लौटी यह रौनक बरकरार रहे, यही इस दीपावली की सबसे बड़ी कामना है।

नोट: गिरफ्तारियां और जब्ती पुलिस की जारी प्रेस विज्ञप्तियों पर आधारित हैं। आरोपों की अंतिम पुष्टि न्यायालय में होगी। दोनों मामलों को अलग-अलग दर्ज प्रकरणों के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

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