महिला आरक्षण बिल: जानें इसके प्रमुख प्रावधान और दक्षिण के राज्यों का विरोध क्यों? जानिए नए नियमों की खास बातें!

ब्रेकिंग न्यूज़: महिला आरक्षण विधेयक और परिसीमन की तैयारी

केंद्र सरकार ने 16 से 18 अप्रैल तक संसद का एक विशेष सत्र बुलाने का निर्णय लिया है। इस सत्र के दौरान मोदी सरकार तीन महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक विधेयक पेश करने जा रही है, जो महिला आरक्षण को जमीनी स्तर पर लागू करने और राजनीतिक नक्शे को पूरी तरह से बदलने के लिए हैं। इन विधेयकों का प्रभाव सीधे 2029 के आम चुनावों पर पड़ेगा। इस प्रक्रिया का सबसे बड़ा प्रस्ताव यह है कि लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों को बढ़ाकर 850 किया जाए।

संसद में पेश होने वाले 3 अहम बिल

सरकार इस विशेष सत्र में तीन प्रमुख विधेयकों को पेश करने की योजना बना रही है:

  1. संविधान (131वां संशोधन) विधेयक: इस विधेयक के तहत लोकसभा की सीटों की संख्या 850 करने का प्रस्ताव है।

  2. परिसीमन (संशोधन) विधेयक: इस विधेयक के अंतर्गत एक ‘परिसीमन आयोग’ का गठन किया जाएगा, जो नई जनगणना के आधार पर सीटों का नया बंटवारा करेगा।

  3. केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक: यह विधेयक दिल्ली, पुडुचेरी और जम्मू-कश्मीर जैसे केंद्र शासित प्रदेशों में मौजूदा कानूनों में संशोधन के लिए लाया जाएगा।

850 सीटों वाली लोकसभा और 273 महिलाओं का आरक्षण

नए ड्राफ्ट के अनुसार, लोकसभा में कुल 850 सीटें होंगी। इनमें से 815 सीटें राज्यों के लिए और 35 सीटें केंद्र शासित प्रदेशों के लिए आरक्षित की जाएंगी। विशेष ध्यान महिलाओं के प्रतिनिधित्व पर दिया गया है। 850 सीटों में से 33 प्रतिशत यानी 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। यह आरक्षण अगले 15 वर्षों तक, 2039 के चुनावों तक सुनिश्चित रहेगा।

परिसीमन प्रक्रिया का महत्व और संभावित लाभ

वर्तमान में देश की लोकसभा सीटें 1971 की जनगणना पर आधारित हैं। नया परिसीमन 2011 की जनगणना के आधार पर किया जाएगा, जिसकी अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के एक मौजूदा या रिटायर्ड जज द्वारा की जाएगी।

रिपोर्ट्स के अनुसार, उत्तर प्रदेश को सबसे बड़ा लाभ होगा, जहां लोकसभा की 40 सीटें बढ़ सकती हैं। वहीं, महाराष्ट्र में सीटों की संख्या 48 से बढ़कर 72 होगी, जिसमें से 24 महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। इसी प्रकार, बिहार की सीटें भी 40 से बढ़कर 60 तक पहुंच सकती हैं।

दक्षिण भारतीय राज्यों की चिंता

इस पूरे प्रक्रिया का तीव्र विरोध दक्षिण भारत से हो रहा है। तमिलनाडु के सीएम एमके स्टालिन और तेलंगाना के सीएम रेवंत रेड्डी ने इस मुद्दे पर आक्रामक रुख अपनाया है। उनका तर्क है कि यदि परिसीमन जनसंख्या आधारित हुआ तो दक्षिण भारतीय राज्यों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व घट जाएगा और उत्तर भारतीय राज्यों का दबदबा बढ़ जाएगा। हालांकि, सरकार का कहना है कि सीटों का आवंटन ‘आनुपातिक प्रतिनिधित्व’ के आधार पर होगा, जिससे किसी राज्य को नुकसान नहीं होगा।

निष्कर्ष

केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित ये विधेयक न केवल महिला प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने के लिए हैं, बल्कि पूरे राजनीतिक परिदृश्य को भी बदलने का कार्य करेंगे। आने वाले दिनों में, विशेष सत्र में इन विधेयकों पर चर्चा होना है, जो चुनावी रणनीतियों और राजनीतिक समीकरणों पर व्यापक असर डाल सकता है। यह बदलाव निश्चित रूप से भारतीय राजनीति में एक नया अध्याय जोड़ने जा रहा है।

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