बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कोरबा जिले के डिस्ट्रिक्ट मिनरल फंड (DMF) से जुड़े कथित मनी लॉन्ड्रिंग और भ्रष्टाचार मामले में जेल में बंद पूर्व आईएएस अधिकारी अनिल टुटेजा की जमानत याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट ने अपराध की गंभीरता, आरोपी की भूमिका और गवाहों को प्रभावित करने की आशंका को ध्यान में रखते हुए राहत देने से इनकार किया।
मामले की सुनवाई जस्टिस नरेन्द्र कुमार व्यास की सिंगल बेंच में हुई। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि आर्थिक अपराध सोच-समझकर किए जाते हैं, जिनमें निजी लाभ को प्राथमिकता दी जाती है, भले ही इससे समाज और अर्थव्यवस्था को नुकसान क्यों न हो।
गिरफ्तारी और आरोप
ईओडब्ल्यू/एसीबी ने DMF घोटाले में 23 फरवरी 2026 को टुटेजा को गिरफ्तार किया था। उस समय वे उद्योग विभाग में अतिरिक्त सचिव के पद पर थे। गिरफ्तारी के बाद से वे न्यायिक हिरासत में हैं। उन्होंने हाईकोर्ट में स्थायी जमानत के लिए आवेदन किया था, जिसमें सह-आरोपियों को सुप्रीम कोर्ट से मिली जमानत और ट्रायल में संभावित देरी का हवाला दिया गया।
कोर्ट की प्रमुख टिप्पणियां
अदालत ने कहा कि केस डायरी और रिकॉर्ड से भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 7 और 12 के तहत आरोपी की संलिप्तता प्रथम दृष्टया स्पष्ट होती है। जांच में सामने आया कि सह-आरोपी सतपाल सिंह छाबड़ा को फर्मों से करीब 16 करोड़ रुपये कमीशन के रूप में मिले, जिसमें से कुछ राशि टुटेजा को भी दी गई।
कोर्ट ने माना कि आरोपी ने अपने पद का दुरुपयोग कर निजी कंपनियों के साथ मिलकर सार्वजनिक धन का दुरुपयोग किया, जिससे जनहित को नुकसान पहुंचा।
पैरिटी का दावा खारिज
टुटेजा ने अन्य आरोपियों—दीपेश टांक, रानू साहू और सौम्या चौरसिया—को मिली जमानत का हवाला देते हुए पैरिटी के आधार पर राहत मांगी थी। इस पर अदालत ने कहा कि वे आरोपी लंबे समय तक जेल में रहे हैं, जबकि टुटेजा को अभी सिर्फ दो महीने ही हिरासत में हुए हैं, इसलिए यह आधार स्वीकार्य नहीं है।
सबूतों से छेड़छाड़ की आशंका
अदालत ने यह भी माना कि आरोपी पहले एक प्रभावशाली पद पर रहा है, ऐसे में जमानत मिलने पर वह सबूतों से छेड़छाड़, गवाहों को प्रभावित करने या जांच में बाधा डाल सकता है। इसी आधार पर कोर्ट ने जमानत याचिका खारिज कर दी।






