ब्रेकिंग न्यूज: बिलासपुर हाईकोर्ट ने दायर आपराधिक अपील को खारिज किया
बिलासपुर, 14 अप्रैल 2026| छत्तीसगढ़ के बिलासपुर हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय लेते हुए राज्य शासन द्वारा दायर आपराधिक अपील को केवल देरी के आधार पर खारिज कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि विभागीय प्रक्रियाओं का हवाला देकर लंबी देरी को उचित नहीं ठहराया जा सकता है।
राज्य शासन का मामला
राज्य शासन ने इस मामले में कोरबा के विशेष न्यायालय के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत आरोपी संजय कुमार यादव (34 वर्ष) को आरोपों से मुक्त किया गया था। यह आदेश 15 अप्रैल को विशेष न्यायाधीश (एससी/एसटी एक्ट), कोरबा द्वारा पारित किया गया था। मामले में आरोपी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 296 और एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 3(1)(आर) व 3(1)(एस) के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी।
108 दिन की देरी का असर
राज्य की ओर से दायर अपील में 108 दिन की देरी हुई थी। राज्य के वकील ने अपने पक्ष में तर्क दिया कि फाइल प्रक्रिया, विधि एवं विधायी कार्य विभाग से अनुमोदन, और महाधिवक्ता से राय लेने में समय लगने के कारण इस देरी का कारण बना। लेकिन न्यायमूर्ति संजय कुमार जायसवाल ने इस दलील को ठुकराते हुए कहा कि केवल विभागीय प्रक्रिया का हवाला देकर दीर्घ काल की देरी को स्वीकार्य नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राज्य को भी लिमिटेशन कानून का पालन करना अनिवार्य है और सरकारी अधिकारियों की लापरवाही या ढिलाई को उचित कारण नहीं माना जा सकता। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण फैसलों का भी उल्लेख किया, जिनमें अविलंबता को लेकर सख्त रुख अपनाया गया है।
न्यायालय का अंतिम निर्णय
हाईकोर्ट ने इस मामले में लागू कानूनों का पालन करते हुए अपील को खारिज कर दिया। इसमें मुख्य आपराधिक अपील भी स्वतः खारिज हो गई। इससे यह स्पष्ट होता है कि कानूनी प्रक्रिया में समयसीमा का पालन अत्यंत महत्वपूर्ण है और इसमें किसी प्रकार की ढिलाई औचित्य नहीं रखती।
निष्कर्ष
इस फैसले से यह संदेश मिलता है कि न्यायालय के समक्ष देरी से दायर की गई अपीलें अस्वीकार हो सकती हैं, भले ही उनका आधार प्रशासनिक कारणों पर हो। यह कदम न्याय प्रणाली की पारदर्शिता और तात्कालिकता को दरशाता है। इससे आगे भविष्य में राज्य प्रशासन को भी मामलों को शीघ्र निपटाने के लिए सजग रहना होगा।