ब्रेकिंग न्यूज़: इजरायली बसाहटों का जाल बढ़ता, जमीन पर कब्जे का मामला गंभीर
पश्चिमी तट पर इजरायली कब्जे के बीच हाल ही में अब्दुल रहमान अज़्ज़म ने अपने पुराने ज़मीन पर वर्षों से उगाए गए जैतून के पेड़ काट डाले। यह एक ऐसा संकेत है जो इजरायली बसाहटों की विस्तार नीति के ख़िलाफ़ संघर्ष का नया अध्याय खोलता है।
ज़मीन पर कब्जे का मामला
अब्दुल रहमान अज़्ज़म, 65 वर्ष, ने अपने पैतृक ज़मीन पर उगाए गए जैतून के पेड़ों को हटाने का दुखद अनुभव किया। यह ज़मीन जेनिन के दक्षिण में स्थित है और हाल ही में इजरायल द्वारा सड़क बनाने के लिए ज़ब्त की गई थी। यह ज़मीन 513 डुनम (लगभग 51.3 हेक्टेयर) है, जिसमें से 450 डुनम केवल अल-फंदाकुमिया गांव के हैं।
सरकार द्वारा ज़मीन कब्जे के इस निर्णय का तत्काल प्रभाव पड़ा है और इस वर्ष फिलिस्तीनी वासियों ने ‘जमीन दिवस’ की 50वीं वर्षगांठ मनाते हुए अपनी संस्कृति से जुड़ी इस समस्या पर ध्यान केंद्रित किया है। जमीर दिवस, 30 मार्च 1976 को हुए घटनाक्रम का स्मरण करता है, जब इजरायली अधिकारियों ने विवादित क्षेत्र की बड़ी मात्रा में ज़मीन पर कब्जा किया था।
कब्जे के तरीकों की बढ़ती संख्या
इजरायल ने ओस्लो समझौतों के तहत पश्चिमी तट को तीन क्षेत्रों में बाँट रखा है। इनमें क्षेत्र ए पूरी तरह फिलिस्तीनी नियंत्रण में है जबकि क्षेत्र सी इजरायल के पूरे नियंत्रण में आता है। क्षेत्र सी में हालिया वर्षो में ज़मीन पर कब्जे के आदेश तेजी से बढ़े हैं।
पश्चिमी तट पर पिछले कुछ समय में, इजरायल ने 2025 से लेकर अब तक 5,572 डुनम ज़मीन पर कब्जा किया है। इन आदेशों का उद्देश्य बसाहटों का विस्तार और उनकी सुरक्षा करना है। हालाँकि कई मामलों में ऐसा प्रतीत होता है कि ये कब्जे बिना किसी आधिकारिक आदेश के भी हो रहे हैं।
समुदायों का विस्थापन
पश्चिमी तट में केवल ज़मीन का कब्जा ही नहीं हो रहा, बल्कि जानबूझकर समुदायों को उनके घरों से बाहर निकाल कर भीड़ को परेशान किया जा रहा है। रामल्ला के पूर्वी हिस्से में बसे बेडुईन समुदाय के कुसाय अबु नائم बताते हैं कि कैसे उन और उनके समुदाय के लोगों को घेराबंदी और हमलों के चलते अपनी जगह छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा।
इजरायली बसाहटों के विरोध में बढ़ते हमलों ने एक स्थिति बना दी है, जहां लोग अपनी जमीन और जीवनशैली से बेघर हो रहे हैं। ओसीएचए के आंकड़ों के अनुसार, जनवरी 2023 से फरवरी 2026 के बीच 4,765 फिलिस्तीनी विभिन्न स्थानों से विस्थापित हुए हैं।
निष्कर्ष
यह घटनाएं फिलिस्तीनी समुदायों के लिए लगातार संघर्ष की कहानी बुनती हैं। ज़मीन पर कब्जा, सामुदायिक विस्थापन और आंसू भरे अनुभव इस भूभाग की गहरे جذ्बातों का संकेत करते हैं। यह मुद्दा केवल भूगोल का नहीं, बल्कि इतिहास और संस्कृति का भी है, जो फिलिस्तीनी लोगों के लिए अतिमहत्त्वपूर्ण है।
