लेखक: दिलीप शर्मा। अक्सर हम कहते हैं कि हम तीर्थ यात्रा पर जा रहे हैं, लेकिन हकीकत में तीर्थ हमें अपने पास बुलाते हैं। मेरी आस्था भले ही कम रही हो, लेकिन हाल ही में संपन्न हुई रामेश्वरम और मदुरै की यात्रा ने मेरे मन को जो असीम शांति और सुकून दिया, वह शब्दों में बयां करना मुश्किल है। यह यात्रा मेरे लिए इसलिए भी अनमोल थी क्योंकि यह मेरे जन्मदिन पर मेरी बेटियों की ओर से दिया गया एक सरप्राइज गिफ्ट था।
सफर का आगाज: विशाखापट्टनम से उड़ान
हमारी यात्रा 30 मार्च 2026 को शुरू हुई। मैं और मेरी पत्नी ओडिशा के खरियार रोड से ‘कोरबा-विशाखापट्टनम लिंक एक्सप्रेस’ द्वारा विशाखापट्टनम के लिए रवाना हुए। अगले दिन सुबह 8 बजे हम स्टेशन पहुंचे। चूंकि हमारी फ्लाइट दोपहर 2:40 बजे बेंगलुरु के लिए थी, इसलिए हमने बचे हुए समय का उपयोग विशाखापट्टनम के प्रसिद्ध आर.के. बीच की लहरों को निहारने में किया।
इसके बाद हम टैक्सी से एयरपोर्ट पहुंचे। यद्यपि मैंने पहले हवाई यात्रा की थी, लेकिन मेरी पत्नी के लिए यह पहला अनुभव था। बोर्डिंग से लेकर विमान के हवा में ऊंचाइयां छूने तक, उनके चेहरे का रोमांच देखने लायक था। मात्र 1 घंटा 20 मिनट के सफर के बाद हम बेंगलुरु लैंड कर गए।
वृंदावन यात्रा अनुभव: भीड़, भक्ति, बंदर और रोमांच की सच्ची कहानी
भावुक क्षण: जब आंखें नम हो गईं
बेंगलुरु एयरपोर्ट से बाहर निकलते ही एक बेहद भावुक दृश्य सामने आया। हमारी दोनों बेटियां, जो वहां रहकर नौकरी करती हैं, फूलों सी मुस्कान लिए खड़ी थीं। इस पूरी यात्रा का सारा खर्च और प्लानिंग उन्हीं की मेहनत का नतीजा था। लंबे समय बाद उन्हें देख हम दोनों की आंखों में खुशी के आंसू छलक आए। बेटियां अपनी मां से लिपट गईं—वह क्षण किसी फिल्म के सुखद अंत जैसा था। वहां से टैक्सी लेकर हम उनके घर पहुंचे।

अगले दिन सुबह बेटियों ने हमें बेंगलुरु के प्रसिद्ध ‘रामेश्वरम कैफे’ में नाश्ता कराया। वहां की इडली और डोसे का स्वाद आज भी जुबां पर है।
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रामेश्वरम: पंबन ब्रिज और 22 कुंडों का दिव्य स्नान
1 अप्रैल 2026 की रात हम चारों बस द्वारा रामेश्वरम के लिए निकले। अगली सुबह जब बस पंबन ब्रिज (Pamban Bridge) से गुजरी, तो समंदर के बीचों-बीच उस इंजीनियरिंग के करिश्मे को देख मन श्रद्धा और आश्चर्य से भर गया।
रामेश्वरम पहुंचते ही हम सीधे समुद्र स्नान के लिए तट पर गए। वहां हजारों की भीड़ और लहरों का शोर एक अलग ही सुकून दे रहा था। समंदर के खारे पानी में स्नान के बाद हम गीले कपड़ों में ही मंदिर के भीतर स्थित 22 कुंडों में स्नान करने पहुंचे। एक के बाद एक कुंड के पवित्र जल से स्नान करते ही शरीर की पूरी थकान और आंखों की जलन गायब हो गई। मन पूरी तरह तरोताजा हो गया।

यादगार जन्मदिन और ज्योतिर्लिंग दर्शन
2 अप्रैल 2026 का दिन मेरे लिए सबसे खास था क्योंकि उस दिन मेरा जन्मदिन था। दोपहर 3 बजे हम रामेश्वरम मंदिर के मुख्य दर्शन के लिए निकले। मंदिर की भव्यता, उसके गलियारे और प्राचीन इतिहास ने हमें मंत्रमुग्ध कर दिया। दर्शन के बाद हमने टैक्सी ली और धनुषकोटि के अंतिम छोर तक गए, जहां समंदर का संगम देखते ही बनता है।
मदुरै: मीनाक्षी मंदिर की विशालता
अगले दिन हम रामेश्वरम से मदुरै के लिए रवाना हुए। दोपहर 12 बजे मदुरै पहुंचकर हमने होटल लिया। यहां हमारा मुख्य उद्देश्य माता मीनाक्षी के दर्शन करना था। जब हम मीनाक्षी मंदिर पहुंचे, तो वहां की विशालता और बारीक नक्काशी देख हम दंग रह गए। मंदिर की भव्यता इतनी विशाल थी कि उसे देखते हुए समय का पता ही नहीं चला। माता के दर्शन कर जो अलौकिक अनुभूति हुई, उसने इस यात्रा को पूर्णता प्रदान की।
घर वापसी
उसी रात मदुरै से ट्रेन पकड़कर हम वापस बेंगलुरु आए। अगले दिन बेंगलुरु से पुनः फ्लाइट द्वारा विशाखापट्टनम और फिर 6 अप्रैल 2026 को हम वापस अपने घर पहुंच गए।
यह यात्रा केवल एक पर्यटन नहीं, बल्कि मेरे बच्चों का वह प्रेम था जिसने मुझे ‘सुकून’ के सही मायने समझाए। रामेश्वरम की लहरें और मीनाक्षी मंदिर की वह भव्यता हमेशा मेरी स्मृतियों में जीवंत रहेगी।
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