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“जीते-जी ‘मृत’ घोषित हुआ किसान, अब हर दफ्तर में साबित कर रहा—’साहब, मैं जिंदा हूं…'”

जीते-जी मौत का दर्द… किसान की आंखों से छलका सिस्टम का सच

छत्तीसगढ़। महासमुंद जिले में सामने आया एक ऐसा मामला, जिसने सरकारी रिकॉर्ड की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। बागबाहरा विकासखंड के ग्राम बाघामुड़ा निवासी बुजुर्ग किसान जीवनलाल साहू (पिता- रामधीन साहू) आज अपने जीवित होने का प्रमाण देने के लिए सरकारी दफ्तरों की चौखट पर भटकने को मजबूर हैं। सरकारी रिकॉर्ड में उन्हें मृत घोषित कर दिया गया है, जबकि वे पूरी तरह स्वस्थ और जीवित हैं।

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इसका खुलासा तब हुआ जब जीवनलाल साहू खेती के लिए खाद लेने सहकारी समिति पहुंचे। आधार प्रमाणीकरण के दौरान मशीन की स्क्रीन पर संदेश उभरा—“Aadhaar deactivated due to deceased status” यानी मृत घोषित होने के कारण आधार निष्क्रिय कर दिया गया है। इसके बाद उन्हें खाद देने से मना कर दिया गया।

एक तरफ खेत में बोनी का समय है, दूसरी ओर एक किसान अपने अस्तित्व को साबित करने की लड़ाई लड़ रहा है। जीवनलाल साहू बताते हैं कि वे राशन दुकान से लेकर जिला सहकारी केंद्र और संबंधित सरकारी कार्यालयों तक कई बार चक्कर लगा चुके हैं, लेकिन हर जगह उन्हें सिर्फ एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर भेज दिया गया। किसी ने भी उनकी समस्या का समाधान करने की जिम्मेदारी नहीं ली।

कैमरे के सामने अपनी पीड़ा बयां करते हुए बुजुर्ग किसान की आंखें नम हो गईं। उन्होंने भर्राए गले से कहा, “मैं जिंदा हूं, लेकिन सरकारी कागजों में मुझे मार दिया गया। जीते-जी मुझे मृत घोषित कर दिया गया। अब मैं हर जगह यही साबित करता फिर रहा हूं कि मैं जिंदा हूं।”

किसान के बेटे ने बताया कि पिता के आधार के निष्क्रिय हो जाने से खाद नहीं मिल रही है और कई अन्य सरकारी योजनाओं का लाभ भी प्रभावित हो गया है। परिवार पिछले कई दिनों से अधिकारियों के चक्कर काट रहा है, लेकिन अब तक किसी भी विभाग ने ठोस पहल नहीं की है।

यह सिर्फ एक किसान की परेशानी नहीं, बल्कि सरकारी व्यवस्था की उस गंभीर चूक का उदाहरण है, जिसमें एक जीवित व्यक्ति को कागजों में मृत घोषित कर दिया जाता है और फिर उसी व्यक्ति को अपने जीवित होने का सबूत देने के लिए दफ्तर-दफ्तर भटकना पड़ता है।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर किसकी लापरवाही से जीवनलाल साहू को सरकारी रिकॉर्ड में मृत दर्ज किया गया? यदि वे जीवित हैं तो उनका आधार किस आधार पर निष्क्रिय किया गया? और इस गंभीर गलती के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर क्या कार्रवाई होगी?

फिलहाल, ग्राम बाघामुड़ा का यह बुजुर्ग किसान सिर्फ एक ही मांग कर रहा है—“मुझे कागजों में फिर से जिंदा कर दीजिए, ताकि मैं अपनी खेती कर सकूं और सम्मान के साथ जी सकूं।”

यह घटना सरकारी तंत्र की संवेदनशीलता और रिकॉर्ड प्रबंधन पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती है। अब देखना होगा कि प्रशासन इस किसान को कब तक न्याय दिलाता है और उसकी पहचान तथा अधिकारों को बहाल करने के लिए क्या कदम उठाता है।

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