महासमुंद। सरकारी योजनाओं के ज़मीनी सच की तस्वीर महासमुंद जिले के कोमाखान तहसील अंतर्गत ग्राम ब्राम्हणडीह में इतनी भयावह है कि यह किसी भी संवेदनशील व्यवस्था को झकझोर दे। ग्राम ब्राम्हणडीह निवासी छबिराम शर्मा (74 वर्ष) और उनकी पत्नी रुखमणी बाई (70 वर्ष) आज भी खप्पर छत वाले कच्चे मिट्टी के मकान में रहने को मजबूर हैं। हालत यह है कि मकान पूरी तरह जर्जर हो चुका है। दीवारें दरक चुकी हैं, छत कभी भी गिर सकती है। ग्रामीणों का कहना है कि इस पंचायत में इससे ज्यादा जर्जर मकान शायद ही कोई और हो।
इसके बावजूद इस बुजुर्ग दंपत्ति को न तो वृद्धा पेंशन मिल रही है और न ही प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ। उम्र के इस पड़ाव पर जहां सरकार “हर गरीब को पक्का मकान” देने का दावा कर रही है, वहीं यह दंपत्ति जान जोखिम में डालकर उसी टूटे-फूटे खपरैल घर में जीवन काट रहा है।
दंपत्ति ने जनसंघ काल से लेकर अब तक कभी किसी दूसरी पार्टी को वोट नहीं दिया, लेकिन आज उनकी ईमानदारी और निष्ठा सजा बन गई। उनके नाम पर मात्र एक एकड़ जमीन है, न आय का स्थायी साधन, न पक्का मकान बनाने की क्षमता—फिर भी सरकारी रिकॉर्ड में इन्हें “अपात्र” ठहरा दिया गया।
वहीं इसी गांव के रसूखदार परिवारों को दो साल पहले ही प्रधानमंत्री आवास मिल चुका है, जबकि उनकी आर्थिक स्थिति इस बुजुर्ग दंपत्ति से कहीं बेहतर बताई जा रही है। पीड़ित दंपत्ति का आरोप है कि आवास सर्वे के दौरान सर्वेयर को “दक्षिणा” नहीं दी गई, इसी कारण उनका नाम सूची से बाहर कर दिया गया। साफ है—जिसके पास रिश्वत देने की ताकत, वही योजना का पात्र।
यह मामला केवल एक परिवार का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े करता है। अगर पंचायत में सबसे जर्जर मकान में रहने वाले बुजुर्गों को भी आवास और पेंशन न मिले, तो फिर सरकारी योजनाओं का औचित्य ही क्या रह जाता है?
अब निगाहें जिला प्रशासन और संबंधित विभागों पर टिकी हैं—क्या इस बुजुर्ग दंपत्ति को इंसाफ मिलेगा? या फिर यह मामला भी कागजों और फाइलों में दफन कर दिया जाएगा? सरकार और प्रशासन को जवाब देना होगा—क्या गरीब होना अब भी सबसे बड़ा अपराध है?



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