महिला आरक्षण पर हंगामा: Amit Shah और अखिलेश यादव की टकरार से गूंजा लोकसभा! वायरल वीडियो में देखें जंग! 🎥🔥

ब्रेकिंग न्यूज़: महिला आरक्षण विधेयक पर संसद में तूफानी बहस

नई दिल्ली: केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव के बीच लोकसभा में महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयक पर तीखी बहस देखने को मिली। इस विवाद ने संसद के विशेष सत्र में गूंज उठी, जहां सांसदों ने अपने विचारों का खुलकर आदान-प्रदान किया।

महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयक पर राजनीतिक बवाल

गुरुवार को केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने संविधान (131वां) संशोधन विधेयक 2026 और परिसीमन विधेयक 2026 को सदन में पेश किया। जैसे ही ये विधेयक पेश हुए, सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने सरकार की जल्दबाजी पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि महिला आरक्षण को लागू करने के लिए पहले देश में जनगणना कराना जरूरी है। इसके बाद, उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार जानबूझकर जातिगत जनगणना में देरी कर रही है।

अमित शाह का विपक्ष पर कड़ा जवाब

अखिलेश यादव के आरोपों पर प्रतिक्रिया करते हुए अमित शाह ने कहा कि देशभर में जनगणना की प्रक्रिया पहले से जारी है। उन्होंने सदन को आश्वासन देते हुए कहा कि जाति आधारित जनगणना भी की जाएगी। शाह ने विपक्ष पर तंज कसते हुए कहा कि क्या कोई खास जाति के घरों की गिनती की जा सकती है? उनकी इस टिप्पणी ने सदन में हलचल पैदा की।

शाह ने यह भी स्पष्ट किया कि भारतीय संविधान के तहत धर्म के आधार पर आरक्षण की कोई व्यवस्था नहीं है। उन्होंने कहा कि मुसलमानों के लिए किसी भी तरह का आरक्षण असंवैधानिक है।

मुस्लिम आरक्षण की मांग और बहस का विस्तार

इस बहस में समाजवादी पार्टी के सांसद धर्मेंद्र यादव ने भी भाग लिया। उन्होंने परिसीमन और जनगणना को अलग रखते हुए इसे संविधान की अवहेलना बताया। धर्मेंद्र यादव ने कहा कि जब तक महिला आरक्षण विधेयक में ओबीसी और मुस्लिम महिलाओं के लिए अलग से कोटा नहीं जोड़ा जाता, तब तक सपा इस विधेयक का समर्थन नहीं करेगी।

अमीश शाह की स्पष्टता के बाद, अखिलेश यादव ने यह सवाल उठाया कि क्या मुस्लिम आबादी 50 प्रतिशत आरक्षण की सीमा से बाहर है। इस बहस के दौरान लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को हस्तक्षेप करना पड़ा और सदन में शिष्टाचार बनाए रखने की अपील की।

निष्कर्ष

महिला आरक्षण विधेयक और परिसीमन विधेयक पर बहस ने संसद में राजनीतिक तापमान को बढ़ा दिया है। विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच उठे मौलिक सवाल और संवैधानिक तर्क स्पष्ट करते हैं कि महिला आरक्षण की प्रक्रिया सिर्फ राजनीतिक कारणों से नहीं, बल्कि सही तरीके से और सभी वर्गों के प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करते हुए लागू होनी चाहिए।

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