Homeदेश - विदेशभूली-परेशान भारतीय सिपाहियों की कहानी: ईरान संघर्ष में इसकी अहमियत

भूली-परेशान भारतीय सिपाहियों की कहानी: ईरान संघर्ष में इसकी अहमियत

बड़ी खबर: भारतीय सेना की इतिहास में अदृश्य भूमिका उजागर

आज हम एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्य पर प्रकाश डालेंगे। विश्व युद्ध पहली और दूसरी में ईरान (पूर्वी फारस) में भारतीय सैनिकों की भूमिका को अक्सर भुला दिया जाता है। जब दुनिया ईरान के मौजूदा संघर्ष का समाधान खोज रही है, तो आइए जानते हैं कि भारतीय जवानों ने इन विश्व युद्धों में कैसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

विश्व युद्ध पहली के दौरान फारस पर कब्जा

पहले विश्व युद्ध में, फारस ने तटस्थ रहने की इच्छा व्यक्त की। लेकिन यह संभव नहीं हो सका, और अंततः फारस पर तुर्क, रूसी और ब्रिटिश बलों का कब्जा हो गया, जिसमें भारतीय सेना भी शामिल थी। ब्रिटिश और रूसी सेनाएँ सहयोगी थीं और उन्होंने फारस को दो क्षेत्रों में विभाजित कर दिया: ब्रिटिश दक्षिण में और रूसी उत्तर में।

ब्रिगेडियर जनरल रेजिनाल्ड डायर, जो भविष्य में जलियांवाले बाग हत्याकांड के लिए कुख्यात हुए, को सीस्टान बल का नेतृत्व सौंपा गया। यह बल फारस में जर्मन और उस्मानी तत्वों के अवरोध को रोकने के लिए भेजा गया था।

दक्षिण फारस राइफल्स का गठन

ब्रिटिश सैन्य इतिहास के अनुसार, 1916 में ब्रिटिश बल मेसोपोटामिया (वर्तमान इराक) में तुर्कों के खिलाफ लड़ाई कर रहे थे। इस दौरान, जब जर्मन गुप्तचरों और फारसी राष्ट्रवादियों ने ब्रिटिश सेनाओं के खिलाफ गतिविधियाँ शुरू कीं, तो ब्रिगेडियर जनरल सर पर्सी साइक्‍स को फारस भेजा गया। उन्होंने दक्षिण फारस राइफल्स का गठन किया, जिसमें लगभग 8,000 फारसी, अरब, और बलूची शामिल हुए थे, और इसमें 600 भारतीय सैनिक भी थे।

विश्व युद्ध दूसरी में भारतीय सेना का योगदान

दूसरे विश्व युद्ध के दौरान, भारतीय सेना ने एक बार फिर फारस में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस विषय पर विस्तृत जानकारी "Paiforce: The Official Story of the Persia and Iraq Command, 1941-1946" किताब में उपलब्ध है। पाईफोर्स के कमांडर लेफ्टिनेंट-जनरल ई.पी. कुइनन थे, जो उच्च रक्तचाप से पीड़ित रहने के बावजूद अपनी यूनिट्स के सफाई पर ध्यान केंद्रित करते थे।

इस दौरान, नफ्ती-शाह और मस्जिद-ए-सुलैमान के तेल के क्षेत्र विश्व में पेट्रोल का सबसे बड़ा स्रोत थे। यह नियंत्रित करना अत्यंत महत्वपूर्ण था, क्योंकि इससे यांत्रिक शक्ति प्राप्त होती थी, जो युद्ध में निर्णायक हो सकती थी।

जर्मन प्रभाव और भारतीय सैनिकों की स्थिति

जर्मनी ने फारस पर काफी प्रभाव बढ़ाया था। तेहरान में कई जर्मन व्यापारी नाजी विचारधारा का प्रचार कर रहे थे। इसी कारण फारसी जनता को जर्मन उत्पादों के प्रति आकर्षित किया जाने लगा।

पंडित रवि रिख्ये, भारतीय सैन्य इतिहासकार, ने पाईफोर्स के बारे में लिखा है कि यह बल उत्तरी ईरान को जर्मन के हमले से बचाने के उद्देश्य से बना था। हालांकि, आवश्यक संसाधनों की कमी और परिवहन की असुविधा के कारण उनकी स्थिति संकटग्रस्त थी।

निष्कर्ष

आज जब दुनिया ईरान की स्थिति पर नजर रख रही है, तो भारतीय सैनिकों का योगदान हमारे इतिहास में एक महत्वपूर्ण पृष्ठ है। यह याद रखना जरूरी है कि भारतीय सेना ने इन संघर्षों में अदृश्य रहकर भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। यह ज्ञान हमें हमारे सैन्य इतिहास को समझने में मदद करता है और इस बात का प्रमाण है कि भारतीय सैनिकों की बहादुरी और प्रतिबद्धता हमेशा तारीखों के पन्नों में जिंदा रहेंगी।

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