भारत में यूरिया की कमी: पश्चिम एशिया संघर्ष और LNG आपूर्ति बाधित

ब्रेकिंग न्यूज: भारत में उर्वरक की आपूर्ति में संकट, मध्य पूर्व के युद्ध का असर!
भारत की प्रमुख खेती में उपयोग होने वाले नाइट्रोजन आधारित यूरिया की आपूर्ति गंभीर जोखिम में है। यह स्थिति अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच चल रहे संघर्ष के कारण पैदा हुई है, जिससे कच्चे तेल के दाम चढ़ गए हैं और एलपीजी की कमी हो रही है।

यूरिया उत्पादन पर LNG आपूर्ति का प्रभाव

खेतों में उर्वरक की कमी से निपटने के लिए खतरे का संकेत बढ़ रहा है। इस संकट का मुख्य कारण यह है कि किसान अनुशंसित नाइट्रोजन और यूरिया अनुपात का पालन नहीं कर रहे हैं, जिससे भारत आयात पर निर्भर हो गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) की आपूर्ति पर असर पड़ने से देश के यूरिया उत्पादन में बाधा आ सकती है।

विज्ञान के अनुसार, उर्वरक मिश्रण में नाइट्रोजन का आदर्श अनुपात चार भाग, फास्फोरस के दो भाग और पोटाश का एक भाग होना चाहिए। हालांकि, भारत में नाइट्रोजन का औसत अनुपात 9:3:1 है, जो कि अनुशंसित मान से कहीं अधिक है। उदाहरण के लिए, नागालैंड में किसान प्रति किलो पोटाश के लिए 101 किलो नाइट्रोजन का उपयोग कर रहे हैं।

आयात पर निर्भरता बढ़ी

1960 के दशक से पहले भारत में उर्वरक का उपयोग काफी कम था। तब कुल खपत केवल 0.3 लाख मैट्रिक टन थी, और खेती मुख्यत: जैविक इनपुट पर निर्भर थी। लेकिन बढ़ती जनसंख्या के चलते खाद्यान्न की मांग को पूरा करने के लिए हरित क्रांति का शुभारंभ हुआ, जिससे नाइट्रोजन आधारित उर्वरक का उपयोग बढ़ गया।

वर्तमान में, 2025 में भारत की यूरिया खपत 387 लाख मैट्रिक टन रिकॉर्ड की गई, जबकि उत्पादन 306 लाख मैट्रिक टन था। इस कमी को भरने के लिए भारत को मध्य पूर्व के देशों से आयात करने की आवश्यकता होती है।

अति उपयोग से उपज में कमी

उर्वरक के उपयोग से तत्काल वृद्धि दिखती है, लेकिन दीर्घकालिक प्रभाव भयानक हो सकते हैं। कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि अत्यधिक नाइट्रोजन के उपयोग से मिट्टी की उर्वरता कम होती जा रही है। अगर किसान अनुशंसित अनुपात का पालन करें, तो न केवल संकट में कमी आएगी, बल्कि भारत यूरिया का निर्यातक भी बन सकता है।

अधिकतम नाइट्रोजन के उपयोग ने न केवल उपज को प्रभावित किया है, बल्कि मिट्टी की संरचना भी कमजोर की है। यह समस्या सामूहिक रूप से सभी कृषि क्षेत्रों में फैली हुई है, जिससे कृषि के समग्र स्वास्थ्य पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है।

अंत में, यह स्पष्ट है कि यदि भारतीय किसान यूरिया का उचित अनुपात अपनाएं, तो भारतीय उर्वरक संकट को हल किया जा सकता है। एक सही दिशा में कदम उठाना चुनौतीपूर्ण हो सकता है, लेकिन दीर्घकालिक लाभ के लिए यह आवश्यक है।

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